“रोजंत त्यागी इंस्पेक्टर ने उतारा पत्रकार का नशा”
कथा में बना वीआईपी हंगामा

सहारनपुर ( विकास बालियान स्वतंत्र पत्रकार एवं हरियाणवी फिल्म अभिनेता)

धार्मिक आयोजनों में इन दिनों भक्ति से ज़्यादा “वीआईपी कल्चर” का बोलबाला नज़र आ रहा है। ऐसा ही नज़ारा उस वक्त देखने को मिला जब हरियाणा से आए एक तथाकथित पत्रकार धरमू ने रामकथा मंच पर खुद को “स्पेशल कवरेज रिपोर्टर” घोषित करते हुए आयोजकों के लिए सिरदर्द खड़ा कर दिया।

धरमू जी आए तो थे श्रद्धा भरे कार्यक्रम में, पर शुरू हो गए “रिपोर्टिंग” से — मंच के पास बैठी महिलाओं की गिनती करने में और यह तंज कसने में कि “यहां महिला कांस्टेबल तो कोई है ही नहीं!”
बात यहीं नहीं रुकी — जनाब आयोजक गुप्ता परिवार की रिज़र्व वीआईपी सीट पर जा बैठे और जब सुरक्षा कर्मियों ने निवेदन किया तो बोले, “मैं प्रेस से हूं!”

फिर क्या था — मौके पर मौजूद रहे जनता त्यागी इंस्पेक्टर रोजंत त्यागी।
त्यागी जी ने पहले समझाया, फिर संयम दिखाया, और आखिरकार जब पत्रकार का “वीआईपी नशा” उतरना ही था, तो उन्होंने वही किया जो पुलिस को करना चाहिए — कानून के दायरे में सलीके से समझाया और “इलाज” भी कर दिया।

धरमू का कहना है कि वह मासूम शर्मा के कार्यक्रम में आए थे और बाद में मीका सिंह से मिलने भी पहुंच गए और पुलिस व्यवस्था पर रिपोर्टिंग करने लगे, लेकिन अब पूरे हरियाणा में “सफाई अभियान” पर हैं, और कोई भी सफाई सुनने को तैयार नहीं।

आयोजकों ने भी कहा कि कई बार समझाया गया कि यह धार्मिक आयोजन है, न कोई प्रेस कॉन्फ़्रेंस। लेकिन जनाब को अपनी “वीआईपी सीट” इतनी प्यारी थी कि श्रद्धा और मर्यादा दोनों भूल गए।
वहीं इंस्पेक्टर रोजंत त्यागी की संतुलित कार्रवाई की हर ओर तारीफ़ हो रही है — लोगों ने कहा, “पुलिस तो पुलिस होती है — लेकिन त्यागी जी जैसी पुलिस अगर हर जगह हो तो कोई गड़बड़ी टिक ही नहीं सकती।”

वीआईपी कल्चर और करोड़ों की कथाएँ
धार्मिक आयोजनों में अब कथा से ज़्यादा चर्चा कथा-वाचकों की फीस की होती है। कभी लाखों में, अब करोड़ों में कथा बोलने वाले कथावाचक अब उन्हीं आयोजकों को चुनते हैं जिनके पास “दान” से ज़्यादा “धन” हो।
और जब आम जनता कथा सुनने आती है, तो उन्हें भी अब वीआईपी की भीड़ में पीछे बैठने की जगह मिलती है।

कवि कुमार विश्वास तक ने अब राजनीति और कविता से कथा-वाचन की दिशा पकड़ ली है — क्योंकि “धंधा अच्छा है”।
पर जो कथा में भाव ढूंढ रहे हैं, उनके लिए ये तमाशा कम और व्यापार ज़्यादा होता जा रहा है।

विकास बालियान की टिप्पणी
हमने भी कोशिश की थी कथा के इस मार्ग पर चलने की — घटना और वृतांत तो याद हो जाते हैं, मगर दोहे रटने में अटक जाते हैं।
और अब डर ये है कि कहीं कथा-वाचन में भी “आरक्षण” की बात शुरू न हो जाए!

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