कुछ किसान आन्दोलन किसानों का नुकसान कर रहे है, उनको रोकना किसान हित में होगा-अशोक बालियान, चेयरमैन,पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन
पंजाब सरकार ने फरवरी 2024 से शंभू और खनौरी बॉर्डर पर मोर्चा लगाकर बैठे किसान संगठनों से बॉर्डर खाली करा लिया है,क्योकि पंजाब से लगातार इस तरह की खबरें आ रही थीं कि किसानों के आंदोलन की वजह से लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
पंजाब के कुछ किसान संगठन पिछले साल फरवरी में अपनी मांगों को लेकर दिल्ली कूच के लिए बढ़े थे। हरियाणा में बार्डरों पर उन्हें रोक लिया गया था, तब से किसान शंभू और खनौरी बॉर्डर पर मोर्चा लगाकर बैठे थे। इस आन्दोलन में 20 फरवरी 2024 को जेसीबी और दूसरे भारी उपकरण किसानों के बीच पहुंच थे।उस समय लग रहा था कि ये सरकार के साथ युद्ध करेंगे
इस कथित किसान आंदोलन ने पंजाब को अरबों रुपये का नुकसान पहुंचाया है। हजारों युवाओं की नौकरी जाने का कारण बना है। क्या ये किसान नेता अपने किए के लिए माफी मांगेंगे? दिल्ली में किसान हित के कृषि कानूनों को वापस कराने के बाद भी अनेक संगठन प्रतिदिन नई-नई मांगों के साथ सामने आ रहे हैं। मतलब साफ है कि देश के कुछ किसान संगठन फंडिंग लेकर आंदोलनरत है और इनका किसान हित से कोई सम्बन्ध नहीं है।
इस आन्दोलन में शामिल एक संगठन भारतीय किसान यूनियन सिद्धूपुर के प्रधान जगजीत सिंह डल्लेवाल का एक वीडियो के सामने आने के बाद इस आंदोलन पर सवाल खड़े होने लगे थे। दरअसल, जगजीत सिंह डल्लेवाल एक वीडियो में कहते हुए दिख रहे थे कि राम मंदिर के बनने के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बहुत तेजी बढ़ गई है।अब उसको नीचे लेकर आना होगा। इस आन्दोलन में शामिल दुसरे किसान संगठन के किसान नेता सरवन सिंह पंथेर का कहना था कि सरकार वह मांग माने, जो हम कह रहे है।
पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन इस तरह के आन्दोलन का समर्थन नहीं करती है, जहाँ किसान का हित न हों। दिल्ली का किसान आंदोलन, जो आभास देता था कि वह देश के समूचे किसानों का आंदोलन था, मगर वास्तविकता में ऐसा था ही नहीं। इसमें पंजाब के बड़े और समृद्ध किसान व आढ़तियों की प्रमुख भूमिका इसमें रही थी और किसानों के अलावा इसमें फंडिंग करने वाली एजेंसी, वामपंथियों व् विपक्षी नेताओं की भूमिका भी थी। इस किसान आंदोलन का मकसद मोदी सरकार को वर्ष 2024 में रोकना भी था।

