नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है.. जरा विपक्ष की हालत तो देख लो..मोदी के सिवा दूसरा कौन?

पुष्पेंद्र राठी

Political Article

आपने ये बात काफ़ी बार सुनी होगी, जैसे कि इसको कहने वाला बताना चाह रहा है कि मोदी जरूरी नहीं मजबूरी है।

मेरी बात माने तो विकल्पहीनता की इस स्थिति से परे शुद्ध ऑब्जेक्टिव रूप में अगर मोदी का आकलन किया जाए तो उसमें भी मैं मानवीय क्षमता और योग्यता के सभी प्रचलित मानदंडों पर मोदी का स्थान सबसे शीर्ष पर पाता हूँ।

मोदी ने पिछले पच्चीस वर्षों में अपनी उपलब्धियों के जो मानदंड स्थापित किए हैं उनकी तुलना उनके किसी भी समकालीन से तो नहीं ही हो सकती, ऐतिहासिक व्यक्तित्वों में भी विरले ही उनके समकक्ष खड़े होंगे।

भारत के इतिहास में मोदी का समकक्ष ढूंढने जाएंगे तो संभवतः आपको शिवाजी तक जाना पड़ेगा। विश्व इतिहास में भी पिछली एक सदी में ली कुआन यू, बेन गुरियन और थोड़ा बहुत मार्गरेट थैचर उनके समकक्ष हैं।

पॉलिटिक्स तो छोड़िए, अन्य किसी भी क्षेत्र में आप अपने आस पास देखिए.. सामाजिक जीवन में, व्यक्तिगत जीवन में, व्यवसाय और खेल में, साहित्य और कला में आपको कौन सा ऐसा व्यक्ति दिखाई देता है जो अपने क्षेत्र में उतने ऊंचे स्टैंडर्ड्स का पालन करता हो, पर्सनल कंडक्ट में हो या प्रोफेशनल अचीवमेंट में मोदी के पासंग बराबर हो? अपने परिवार में, अपने वर्कप्लेस में, अपने जीवन में और अपने आईने में भी देख लीजिए, कोई आस पास भी हो तो एक बार मिलना चाहूंगा.

लेकिन परफेक्शन वह स्टैंडर्ड है जिससे तुलना करके किसी को भी बौना दिखाया जा सकता है. मोदी के विरोधियों के पास और कोई विकल्प नहीं था तो मोदी का एक काल्पनिक, अवास्तविक और इडियलाइज्ड प्रतिबिंब ही मोदी के विरुद्ध खड़ा कर दिया.

मैंने मोदी को कभी भी महामानव, अवतार और मसीहा नहीं माना. उन्हें कंटेंपररी स्टैंडर्ड से एक योग्य और भरोसेमंद नेता ही माना और उस स्टैंडर्ड से अभी तक मेरी अपेक्षा से अधिक मिला है. ऐसा नहीं है कि मोदी की सरकार में गलतियाँ नहीं हुई हैं, आप अगर चार गिनाएंगे तो मैं चौदह गिना सकता हूँ लेकिन उनमें से कोई भी ऐसी नहीं है जो सुधारी न जा सके, जो उनकी उपलब्धियों पर भारी पड़े या मुझे उनके विरुद्ध खड़े होने का पर्याप्त कारण दे.

मैंने थैचर की मोदी से तुलना की, लेकिन तीन बार चुनावों में विजयी रहने वाली मार्गरेट थैचर को भी अपने कैरियर के अंत में अपनी पार्टी द्वारा ही अपदस्थ और उपेक्षित कर दिया गया. पर उसके बाद के साढ़े तीन दशकों में UK 🇬🇧 लगातार रसातल में जा रहा है, और बाद में आने वाला कोई भी नेता आजतक थैचर के जूते की तली से ऊपर नहीं खड़ा हो पाया है. मोदी से छुटकारा पाने की बेचैनी तो है, लेकिन उसके परिणाम क्या होंगे यह स्पष्ट है।

परंतु सबसे बड़ी दुविधा यह है कि इतिहास से हम बस इतना ही सीखते हैं कि इतिहास से हम ज्यादा कुछ नहीं सीखते

और हाँ, अगर किसी के पास इस बात का जवाब हो तो ज़रूर देना कि मोदी से पहले इस देश के हिंदुओं ने कौन-सी ऐसी लड़ाई (चाहे पुराने समय के युद्ध हों या आज़ादी के बाद के चुनाव) लड़ी है, जिसमें कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सिर्फ़ और सिर्फ़ हिंदू आइडेंटिटी के नाम पर एकजुट होकर भाग लिया हो?

मेरे विचार मे इसका क्रेडिट भी मोदी जी को ही जाता है। जो काम ना अटल जी और ना आडवाणी जी कर पाए – बल्कि पिछली कई सदियों में कोई नहीं कर पाया वो 2014 में हुआ।

कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिंदू एक पहचान के नाम पर खड़ा हुआ जिसको अब जातंकवादी तरह तरह के षड़यंत्र रचकर तोड़ने मे लगे हुए है।

पुष्पेंद्र राठी,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *