इसी दौरान ट्रैक पर गति परीक्षण का कार्य भी पूरा होगा। 130 किलोमीटर प्रति घंटा की गति से ट्रेन दौड़ाने का लक्ष्य रखा गया है। सबकुछ सही होने पर सीआरएस इस रूट पर नियमित ट्रेनों के संचालन की अनुमति दे देंगे। इसके बाद 13 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हरी झंडी दिखाकर पहली यात्री ट्रेन को रवाना करेंगे। रामबाग से झूंसी के बीच दोहरी रेल लाइन में ही दारागंज-झूंसी नया गंगा पुल भी शामिल है।
झूंसी-रामबाग रेल ट्रैक पर आज रहेगा प्रतिबंध
झूंसी-रामबाग रेल ट्रैक पर बुधवार को ट्रायल के दौरान लोगों का आवागमन प्रतिबंधित रहेगा। इसके लिए रेलवे ने निर्देश जारी कर दिया है। मंडल पीआरओ अशोक कुमार ने बताया कि रामबाग- झूंसी रेल खंड के नवनिर्मित पुल, एप्रोच वायडक्ट के विद्युतीकृत लाइन के साथ दोहरीकरण कार्य पूरा हो गया है। बुधवार को मुख्य रेल संरक्षा आयुक्त जनक कुमार गर्ग इसका निरीक्षण करेंगे।
उनके साथ रेल प्रशासन व आरवीएनएल की टीम भी होगी। पहले धीमी गति से ट्रेन को चलाया जाएगा और फिर पूरी गति से ट्रेन दौड़ाई जाएगी। झूंसी–प्रयागराज रामबाग के बीच रेलवे ट्रैक के आस-पास के लोगों से अपील है कि वे सीआरएस के निरीक्षण व गति परीक्षण के दौरान इस रेल खंड, विद्युत ट्रैक्शन/पोलों से दूरी बनाये रखें। अपने बच्चों व पशुओं को रेल ट्रैक के नजदीक न जाने दें। यह यह खतरनाक हो सकता है।
क्या होगा फायदा
- प्रयागराज जंक्शन से वाराणसी-के बीच यात्रा का समय घटेगा
- झूंसी और रामबाग में ट्रेनों का पास देने के लिए रोकना नहीं पड़ेगा
- ट्रेनों की संख्या और गति दोनों बढ़ जाएगी
- महाकुंभ के दौरान अधिक संख्या में ट्रेनों का संचालन होगा
- प्रयागराज-अयोध्या-वारारणसी रिंग रेल चलेगी
- ईएमयू स्पेशल ट्रेनें चलेंगी
नंबर गेम
- 120 किलोमीटर रेल ट्रैक का हो रही है दोहरीकरण
- 130 किमी प्रति घंटा की गति से चल सकेंगी ट्रेनें
- 120 मिनट में प्रयागराज से पहुंच जाएंगे वाराणसी
- 111 नंबर से जाना जाएगा दारागंज-झूंसी रेल पुल
- 496.62 करोड़ की लागत पुल बनाने में आई है
- 1934 मीटर लंबाई व दो रेल लाइन पुल पर हैं
ब्रिटिश इंजीनियर आइजेट के नाम पर स्थापित पुराना गंगा पुल
प्रयागराज के दारागंज को झूसी से जोड़ने वाला पुराना गंगा पुल, जो ब्रिटिश इंजीनियर आइजेट की देखरेख में निर्मित हुआ, आज भी अपनी वास्तुकला और ऐतिहासिकता के लिए जाना जाता है। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान बनी इस संरचना को आमतौर पर आइजेट पुल के नाम से भी जाना जाता है। यह पुल गंगा नदी पर स्थित है और इसे बंगाल नॉर्थ वेस्टर्न रेलवे के द्वारा प्रयागराज-वाराणसी के बीच छोटी लाइन बिछाने के कार्य के अंतर्गत बनाया गया था।
इस पुल का निर्माण उस समय की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए किया गया था, ताकि दोनों शहरों के बीच रेलवे यातायात को सुगम बनाया जा सके। 31 अक्टूबर 1912 को इस पुल पर रेल यातायात की शुरुआत हुई, जिसने क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पुल की संरचना
पुराने गंगा पुल के डिजाइन में 40 स्पैन शामिल हैं, जिनमें से प्रत्येक स्पैन एक ओपन वेब गर्डर के रूप में तैयार किया गया है। प्रत्येक गर्डर की लंबाई 45.72 मीटर है, जो इसकी स्थिरता और मजबूती का प्रतीक है। इस पुल की भव्यता और तकनीकी नवाचार ने इसे आज भी एक मजबूत और टिकाऊ संरचना के रूप में सुरक्षित रखा है।
ऐतिहासिक महत्व
हालांकि समय के साथ यह पुल अब इतिहास के पृष्ठों में दर्ज हो गया है, लेकिन इसकी महत्ता आज भी अटूट है। यह पुल न केवल प्रयागराज और वाराणसी के बीच एक प्रमुख यातायात मार्ग है, बल्कि यह उन लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल भी है, जो भारतीय रेलवे के विकास और ब्रिटिश राज के दौरान हुई अवसंरचनात्मक प्रगति के बारे में जानने के लिए इसे देखते हैं।
आइजेट पुल का निर्माण भारतीय रेलवे की एक सुनहरी धरोहर के रूप में आज भी खड़ा है। इसका मजबूती से खड़ा रहना और इसकी ऐतिहासिक संरचना इसे केवल एक पुल नहीं, बल्कि इतिहास की कड़ी बनाता है। भारतीय रेलवे के विकास में इस पुल का योगदान सदियों तक याद किया जाएगा।

