दुनिया को अलविदा कह गई बहराइच की ‘मोगली गर्ल’ एहसास, कभी बंदरों के झुंड के साथ जंगल में मिली थी
लखनऊ/बहराइच। करीब एक दशक पहले बहराइच के कतरनियाघाट वन्यजीव अभयारण्य के जंगलों में मिली और पूरे देश में ‘मोगली गर्ल’ के नाम से चर्चित हुई एहसास ने 15 जून को अंतिम सांस ली। 18 वर्षीय एहसास का निधन लखनऊ के डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में फेफड़ों से जुड़ी बीमारी के चलते हुआ। उसकी जिंदगी की कहानी आज भी लोगों को हैरान कर देती है।
एहसास पहली बार वर्ष 2017 में चर्चा में आई थी, जब बहराइच के कतरनियाघाट अभयारण्य की मोतीपुर रेंज में पुलिस गश्त के दौरान उसे बंदरों के एक झुंड के साथ देखा गया। बताया जाता है कि जब पुलिसकर्मियों ने बच्ची को अपने पास लाने की कोशिश की तो बंदरों ने विरोध किया और जोर-जोर से चीखने लगे। बच्ची भी उसी तरह की आवाजें निकाल रही थी। काफी मशक्कत के बाद पुलिस उसे वहां से निकालकर अस्पताल ले जा सकी।
रेस्क्यू के समय उसकी हालत बेहद खराब थी। वह न तो बोल पाती थी और न ही किसी भाषा को समझती थी। इंसानों को देखकर डर जाती थी और अक्सर जानवरों की तरह चारों हाथ-पैरों के बल चलती थी। उसके बाल और नाखून बढ़े हुए थे तथा शरीर पर कई चोटों के निशान भी थे। डॉक्टरों के अनुसार वह सामान्य बच्चों की तरह व्यवहार नहीं करती थी और कई बार आक्रामक भी हो जाती थी।
रेस्क्यू के बाद उसे पहले बहराइच जिला अस्पताल और बाद में बेहतर इलाज व पुनर्वास के लिए लखनऊ भेजा गया। वहीं उसका नाम ‘एहसास’ रखा गया। समय के साथ उसने कुछ बातें सीखीं, कपड़े पहनना शुरू किया और लोगों के बीच रहना भी सीखा, लेकिन वह कभी पूरी तरह सामान्य जीवन नहीं जी सकी। इलाज के दौरान उसमें सुधार तो हुआ, मगर उसकी प्रगति काफी धीमी रही।
हालांकि ‘मोगली गर्ल’ की कहानी को लेकर समय-समय पर अलग-अलग दावे भी सामने आए। कुछ अधिकारियों ने यह भी कहा था कि उसके लंबे समय तक बंदरों के साथ रहने के दावों की पूरी तरह पुष्टि नहीं हो सकी थी, लेकिन उसके व्यवहार ने उसे देश-दुनिया में चर्चा का विषय बना दिया था।
अब एहसास के निधन के साथ एक ऐसी कहानी का अंत हो गया, जिसने मानव जीवन, जंगल और पुनर्वास की चुनौतियों को दुनिया के सामने लाकर खड़ा कर दिया था।
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