जयंती विशेष | राजसत्ता पोस्ट

पंडित प्रकाश वीर शास्त्री : विचार, वाणी और राष्ट्र के प्रति समर्पण का प्रतीक

पंडित प्रकाश वीर शास्त्री भारतीय संसदीय इतिहास के उन विशिष्ट व्यक्तित्वों में शामिल रहे, जिन्होंने राजनीति को केवल सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण का साधन माना। अपनी ओजस्वी वाणी, तथ्यपरक तर्क और निर्भीक विचारों के कारण वे संसद में विशेष सम्मान के पात्र रहे। उनके भाषणों को सभी दलों के सदस्य गंभीरता से सुनते थे।

पंडित प्रकाश वीर शास्त्री का जन्म 30 दिसंबर 1923 को उत्तर प्रदेश के रहरा (रेहरा) गांव जनपद मुरादाबाद (अब अमरोहा)में जमींदार परिवार में हुआ। उनके पिता चौधरी दिलीप सिंह त्यागी थे। पारिवारिक संस्कार, वैदिक परंपरा और राष्ट्रवादी वातावरण ने उनके व्यक्तित्व की नींव रखी।

शिक्षा और वैचारिक आधार

उन्होंने गुरुकुल परंपरा में शिक्षा प्राप्त की तथा संस्कृत, हिंदी और भारतीय दर्शन का गहन अध्ययन किया। “शास्त्री” की उपाधि उनके विद्वान व्यक्तित्व की पहचान बनी। छात्र जीवन से ही वे सामाजिक अन्याय, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक चेतना से जुड़े प्रश्नों के प्रति सजग रहे।

साहित्य और विचार लेखन

वर्ष 1952 में उन्होंने पुस्तक “मेरे सपनों का भारत” लिखी, जिसमें आदर्श शासन व्यवस्था, राजा (शासक) के कर्तव्यों और प्रशासनिक नैतिकता पर मार्गदर्शन प्रस्तुत किया। यह पुस्तक स्वतंत्र भारत के शासकीय तंत्र के लिए वैचारिक दस्तावेज मानी जाती है।

कश्मीर की स्थिति को लेकर उन्होंने संसद के भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर आवाज उठाई। “धधकता कश्मीर” और “कश्मीर की वेदी पर” जैसी पुस्तकों में उन्होंने कश्मीर के पौराणिक इतिहास, स्वतंत्रता के बाद की परिस्थितियों तथा डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आंदोलन का विस्तृत वर्णन किया।

संसदीय जीवन

स्वतंत्रता के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और लंबे समय तक निर्दलीय रहते हुए संसद में प्रभावी भूमिका निभाई।

  • 1958 में गुडगांव (हरियाणा) से लोकसभा सांसद बने
  • 1962 में बिजनौर (उत्तर प्रदेश) से निर्वाचित हुए
  • 1967 में हापुड़ (गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश) से लोकसभा पहुंचे
  • 1974 में राज्यसभा सदस्य बने (जनसंघ के सहयोग से)

इस प्रकार वे लगातार लगभग 20 वर्षों तक संसद के सदस्य रहे—तीन बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा।

प्रमुख संसदीय योगदान

पंडित प्रकाश वीर शास्त्री ने संसद में धारा 370, राष्ट्रीय एकता, हिंदी भाषा, शिक्षा और कृषि जैसे विषयों पर तथ्यात्मक और शोधपूर्ण वक्तव्य दिए।

किसानों के हित, विशेषकर गन्ना मूल्य, बकाया भुगतान और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बांध निर्माण जैसे मुद्दों को उन्होंने प्रमुखता से उठाया। वे समस्याओं के साथ-साथ समाधान भी प्रस्तुत करते थे, जिससे उनकी राजनीति सकारात्मक दृष्टिकोण का उदाहरण बनी।

उनके भाषण शुद्ध हिंदी, प्रवाहपूर्ण शैली और शालीन शब्दावली के लिए जाने जाते थे। उन्हें “सरस्वती का वरदान प्राप्त वक्ता” कहा जाता था।

शिक्षा और संस्कृति में योगदान

उन्होंने उत्तर प्रदेश और दिल्ली में कई विद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थापना में भूमिका निभाई। वे गुरुकुल वृंदावन और गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर के उपकुलपति भी रहे।

भारतीय संस्कृति और भाषाओं के संरक्षण के लिए उन्होंने विशेष प्रयास किए। हिंदी और भारतीय भाषाओं के उत्थान के लिए वे आज़ादी के बाद कई आंदोलनों से जुड़े रहे।

वर्ष 1974 में जर्मनी में आयोजित इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन सम्मेलन में उन्होंने पहली बार अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिंदी में भाषण देकर इतिहास रचा।

उन्होंने देवनागरी को सभी भारतीय भाषाओं की साझा लिपि बनाने का प्रस्ताव भी संसद में रखा तथा वेदों के अंग्रेज़ी अनुवाद के लिए वेद प्रतिष्ठान की स्थापना करवाई।

सरदार पटेल जयंती की परंपरा

दिल्ली में सरदार वल्लभभाई पटेल की विराट जयंती समारोह की परंपरा की शुरुआत भी पंडित प्रकाश वीर शास्त्री ने ही की, जो 1960 से 1977 तक निरंतर आयोजित होती रही।

अटल बिहारी वाजपेयी से मित्रता

पंडित प्रकाश वीर शास्त्री पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निकट मित्रों में रहे। वर्ष 1977 में दोनों सांसद थे और दिल्ली में उनके सरकारी आवास पास-पास थे। मित्रता इतनी प्रगाढ़ थी कि आवागमन की असुविधा को देखते हुए वाजपेयी जी ने दोनों आवासों के बीच की दीवार तक हटवा दी थी।

अटल बिहारी वाजपेयी की सलाह पर ही पंडित शास्त्री ने अपने गांव रहरा में इंजीनियरिंग कॉलेज की नींव रखने का निर्णय लिया।

निधन

23 नवंबर 1977 को एक रेल दुर्घटना में उनका असामयिक निधन हो गया। उनके निधन को राष्ट्रवादी, सांस्कृतिक और विचारप्रधान राजनीति के लिए बड़ी क्षति माना गया।

विरासत

पंडित प्रकाश वीर शास्त्री आज भी
निर्भीक सांसद, विद्वान वक्ता, सांस्कृतिक प्रहरी और राष्ट्रहित के प्रति समर्पित नेता के रूप में स्मरण किए जाते हैं।
उनका जीवन भारतीय राजनीति के लिए एक स्थायी प्रेरणा है।

आज 30 दिसंबर, उनकी जयंती पर
राजसत्ता पोस्ट की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि।


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