ग्रामीणों ने उठाई आवाज: “प्रधान ने गांव का नहीं, अपना विकास किया”
आजादी के 76 साल बाद भी देवबंद का अंबेहटा शेखां गांव मूलभूत सुविधाओं से वंचित

प्रशांत त्यागी
सहारनपुर: देवबंद विकासखंड की ग्राम पंचायत अंबेहटा शेखां की करीब 16 हजार आबादी आज भी टूटी सड़कों और गंदगी के बीच जिंदगी गुजारने को मजबूर है। आजादी के 76 वर्षों बाद भी यह गांव मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि ग्राम प्रधान ने विकास के नाम पर केवल खानापूर्ति की है। गांव की सफाई व्यवस्था बदहाल है और जल निकासी की व्यवस्था न होने से बरसात में पूरा गांव तालाब बन जाता है। गांव में लगे वॉटर टैंक भी खराब पड़े हैं, जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि विकास के लिए आया पैसा बंदरबांट कर लिया गया, लेकिन गांव की हालत जस की तस है।
,
पूर्व प्रधान ऋषिराज त्यागी का कहना है कि “गांव में कोई ठोस विकास कार्य नहीं हुआ। सचिव और ग्राम प्रधान ने विकास का पैसा अपनी जेब में डाल लिया। गांव का नहीं, अपना विकास किया गया है।”
गांव के संजय त्यागी ने भी ग्राम प्रधान पर विकास कार्यों में भेदभाव का आरोप लगाया। दलित समाज की एक महिला ने आरोप लगाया कि “आज तक गांव में दलितों के लिए श्मशान घाट तक नहीं दिया गया। हमें तालाब किनारे ही अंतिम संस्कार करना पड़ता है। आजादी के बाद भी हमें हक नहीं मिला।”

ग्राम प्रधान का पक्ष
ग्राम प्रधान प्रतिनिधि नदीम त्यागी ने ग्रामीणों के आरोपों को बेबुनियाद और राजनीति से प्रेरित बताया। उन्होंने कहा, “गांव में अब तक सबसे ज्यादा विकास हुआ है। जिस मार्ग को लेकर गंदगी और जलभराव की बात हो रही है, उस पर कोर्ट से स्टे है, जिसके चलते सड़क नहीं बन पाई। श्मशान घाट सरकार और शासन के तहत आता है, ग्राम पंचायत के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। गांव में विकास में कोई भेदभाव नहीं किया गया है।”
हकीकत यह है कि बरसात में तालाब बन जाने वाले इस गांव की तस्वीर अभी भी विकास की राह देख रही है। ग्राम पंचायत और प्रशासन के बीच जिम्मेदारियों के खेल में ग्रामीण आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

