आगरा। नौ मई 2012 की सुबह सामूहिक हत्याकांड से अछनेरा का गांव तुरकिया दहशत में आ गया। घर के दो कमरों में परिवार के छह सदस्यों के रक्त रंजित शव पड़े थे। आरोप लगा कि घर के मंझले बेटे गंभीर सिंह ने अपने बड़े भाई सत्यभान, उसकी पत्नी और चार बच्चों की कुल्हाड़ी से काटकर हत्या कर दी। सेशन कोर्ट ने घटना को गंभीर को मृत्युदंड दिया, जिसे हाई कोर्ट ने सजा बरकरार रखी।
13 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने सजा को निरस्त करते हुए गंभीर को दोष मुक्त कर तत्काल जेल से रिहाई का आदेश दिए। रविवार को सुप्रीम फैसले की जानकारी मिलने पर पूरा गांव अवाक रह गया। हर गली और नुक्कड़ पर हत्याकांड और गंभीर सिंह की ही चर्चा थी।
अछनेरा क्षेत्र के गांव तुरकिया में नौ मई 2012 को किसान सत्यभान, उनकी पत्नी पुष्पा, छह वर्षीय बेटी आरती, तीन वर्षीय मछला, दो वर्षीय गुड़िया और चार वर्षीय बेटा कन्हैया की हत्या के कुछ घंटे बाद ही सत्यभान के छोटे भाई गंभीर, उसके नाबालिग दोस्त और बहन गायत्री को घटना वाले दिन ही जेल भेज दिया था।
पांच साल तक चले मुकदमे में एडीजे कोर्ट से गंभीर सिंह को दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई और बाकी को बरी कर दिया। अपने घर के बाहर तख्त पर बैठे रिटायर्ड हवलदार लाल सिंह फोन पर इसी फैसले की चर्चा करते हुए मिले। लाल सिंह का कहना था कि सत्यभान का घर हमारे घर के पीछे था। घटना वाली रात का तो पता नहीं, सुबह जब भीड़ जुटी तब पता चला। घटना के बाद से परिवार से संपर्क ही टूट गया।

गंभीर के जेल से आने को लेकर डरे हैं लोग

आज गंभीर के बरी होने की खबर मिली। अब कोर्ट के फैसले पर हम क्या टिप्पणी करें। जो होता है अच्छा होता है। जेल से छूटने के बाद गंभीर गांव लौटेगा या नहीं, ये भी पता नहीं। वहीं लेखराज का कहना था कि हमें फैसले का पता है, लेकिन हम क्या कहें? वहीं गांव के कुछ लोग गंभीर के जेल से आने को लेकर डरे हुए हैं। उन्होंने कुछ भी कहने से इन्कार कर दिया।

पुलिस ने लिखी थी ये कहानी

पुलिस ने घर में भूसे के ढेर से खून से सनी कुल्हाड़ी, चाकू व एक खाली शीशी मिली थी। पुलिस ने कहानी लिखी कि शीशी से नशीला पदार्थ मिलाकर कोल्ड ड्रिंक में पिलाया गया। इसके बाद हत्या की गई। कुल्हाड़ी और चाकू को उस पर लगे खून की जांच के लिए फोरेंसिक लैब भेजा गया। 10 जुलाई 2012 को विवेचक राजीव यादव ने बरामदगी और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर तीनों के खिलाफ चार्जशीट लगा दी। लैब से आई रिपोर्ट में कुल्हाड़ी और चाकू पर लगा खून मानव का बताया, लेकिन ब्लड ग्रुप की रिपोर्ट नहीं दी जा सकी।

सुप्रीम कोर्ट ने में नहीं टिकी कहानी

सुप्रीम कोर्ट ने इसी को फैसले में एक आधार बनाया। 28 जनवरी को सुनाए गए फैसले में कोर्ट ने कहा कि केवल आरोपित को वहां देखे जाने के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। आला कत्ल की बरामदगी हुई। उस पर लगे खून की जांच फोरेंसिक लैब द्वारा की गई। इसमें ब्लड ग्रुप नहीं पता चला। ऐसे में हथियारों की बरामदगी बेकार रही। अभियोजन पक्ष पूरी तरह आरोप साबित करने में विफल रहा। इसलिए मृत्युदंड को बरकरार नहीं रखा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपित को बरी करते हुए उसकी तत्काल रिहाई के आदेश दिए।घर बेचकर दिल्ली चला गया था छोटा भाई

सत्यभान का सबसे छोटा भाई कान्हा घटना के बाद गांव से चला गया था। कुछ साल बाद उसने घर पड़ोसी लाल सिंह को बेचा और दिल्ली चला गया। लाल सिंह ने घर को अपने घर मिला गया। जहां भूसा भरा जाता है और एक हिस्से में भैंसे बांधी जाती हैं। लाल सिंह ने बताया कि घटना रूह कंपा देने वाली थी।पुलिस ने गंभीर को हत्या के आरोप में जेल भेजा था। अब वह जेल से रिहा होकर आए तो उन्हें और गांव को कोई आपत्ति नहीं है। जल्द उसकी जिला जेल से रिहाई हो सकती है।2019 में सुप्रीम कोर्ट गया था मामला

  • घटना का मुकदमा सत्यभान के साले अरदाया निवासी महावीर ने गंभीर सिंह, उसके नाबालिग दोस्त और बहन गायत्री के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था।
  • 20 मार्च 2017 को मृत्यु दंड मिलने के बाद गंभीर ने विधिक प्राधिकरण के जरिए हाईकोर्ट में अपील की।
  • 2019 में हाई कोर्ट ने भी मृत्युदंड को बरकरार रखा।
  • इसके बाद 31 जनवरी 2019 को आरोपित गंभीर की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अपील को याचिका दायर की गई।
  • पांच साल तक चले मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने 28 जनवरी को फैसला सुनाया।

अब न घर रहा और खेत

बड़े भाई और उसके पूरे परिवार की हत्या के पीछे एक बीघा खेत बताया गया, लेकिन अब न घर रहा और खेत। पारिवारिक सूत्रों के अनुसार सत्यभान के पिता शिव सिंह सेना में थे। उनके पास आठ बीघा जमीन थी। पहली पत्नी सफेदी की मृत्यु के बाद उन्होंने आशा देवी से विवाह कर लिया। पहली पत्नी से बेटा धर्मवीर ननिहाल चला गया। वहीं आशा देवी से पांच बच्चे सत्यभान सिंह, गंभीर सिंह और कान्हा व बेटियां रेखा और गायत्री थीं। शिव सिंह ने दो बीघा खेत बेच दिया था। पत्नी आशा देवी के नाम वसीयत कर दी थी। बाद में सत्यभान सिंह और गंभीर ने मिलकर दो बीघा खेत बेच दिया।

गंभीर सिंह गया था जेल

परिवार के पास करीब साढ़े तीन बीघा खेत बचा था। 2007 में मां आशा देवी के हत्यारोप में गंभीर सिंह जेल गया। जेल जाने के बाद गंभीर ने भाई से कहा कि मेरे हिस्से का एक बीघा खेत ले लो और मुझे जेल से निकलवाओ। 2010 में जेल छूटकर बाहर आया। इसके बाद वह अपने हिस्से की जमीन मांगने लगा। बताया गया है कि एक बीघा खेत विवाद में उसे भाई और उसके परिवार की हत्या कर दी। अब घर और खेत सब बिक चुका है।

जेल प्रशासन को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतजार

सामूहिक हत्याकांड में बरी किया गया गंभीर सिंह फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद से सेंट्रल जेल में निरुद्ध है। उसे जेल में सर्किल नंबर तीन की बैरक में रखा गया है। जिसमें उसके साथ 80 से अधिक बंदी रखे गए हैं। वह साथी बंदियों से अधिक घुलामिला नहीं है। जेल प्रशासन के रिकार्ड में उसका व्यवहार संतोषजनक है। जेलर दीपांकर भारती ने बताया कि रिहाई के संबंध में आदेश नहीं मिला है। आदेश आने के बाद रिहाई की प्रक्रिया आरंभ की जाएगी।

सामूहिक हत्याकांड में गंभीर सिंह के बरी होने की खबर के बाद से मुकदमे में वादी सत्यभान के साले आरदया निवासी महावीर का परिवार दहशत में है। मिठाई की दुकान पर काम करने वाले महावीर ने बताया कि सत्र न्यायालय से आरोपित को फांसी की सजा के बाद वह चैन से परिवार का पालन पोषण करने के लिए मजदूरी कर रहा था।

आरोपित की सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही थी इसका उसके पास न कोई नोटिस आया न सूचना ही दी गयी। गंभीर खूंखार किस्म का है। उसके बरी होने की खबर के बाद से उसके जेल से छूटने के बाद परिवार की सुरक्षा की चिंता सता रही है। पुलिस से सुरक्षा की मांग की है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *