रा.न.द. पूर्ण रूप से रावण दहन का विरोध करती है : अभिषेक त्यागी
राष्ट्रवादी नवनिर्माण दल के राष्ट्रीय महासचिव संगठन अभिषेक त्यागी ने कहा कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीकांत त्यागी जी का स्पष्ट संदेश अपने कार्यकर्ताओं को है की इस प्रकार के किसी भी कार्यक्रम में पार्टी का कोई पदाधिकारी सम्मिलित नहीं होगा।
पूर्व में बहुत प्रकार की प्रथाएँ समाज को चेतना देन हेतु बनायी गई जिसमें समय समय पर बदलाव किया गया या प्रतिबंधित किया गया क्योंकि पूर्व की चेतना है भविष्य में संवाद तोड़ने वह समाज में वैमनस्य फैलाने का कार्य करती दिखाई पड़ रही थी उदाहरण के लिए सती प्रथा,बाल विवाह प्रथा एवं विधवा प्रथा है जिसमें महिला के विधवा होने के बाद उसको संपूर्ण जीवन गंजा व सफ़ेद वस्त्र में जीवन व्यापन करना होता था व समाज के किसी भी व्यक्ति के सामने आने की अनुमति प्राप्त नहीं थी ऐसी सभी प्रथाओं को धीरे-धीरे समाप्त करने या पूर्णतः प्रतिबंध करने का कार्य किया गया है इसी इसी क्रम में आपसे अनुरोध है कि त्यागी भूमिहार ब्राह्मण समाज पूर्वज परम ज्ञानी महान शिव भक्त महर्षि विश्रवा के पुत्र महाराजा रावण जिनको पौराणिक काल से भगवान शिव का सम्पूर्ण विश्व में सबसे बड़े भक्त की ख्याति एवं जिनको त्रिलोक पति की ख्याति व शिव तांडव स्रोत के रचियता (जो की आज हिन्दू धर्म के हर घर, मंदिर व धाम में भगवान शिव की पूजा अर्चना में सबसे ज़्यादा प्रयोग किए जाने वाला भजन है) एवं स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम राम द्वारा रावण के प्राण त्याग देते हुए अंतिम समय में अपने छोटे भाई लक्ष्मण को यह निर्देश देकर कहना कि रावण कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है ये अत्यंत बुद्धिमान परम विद्वान राजा है जाओ इनके अंतिम समय में इनसे जितना ज्ञान प्राप्त हो सके वह ज्ञान तुम्हें प्राप्त करना चाहिए (जिसको महर्षि बाल्मीकि जी द्वारा रचित रामायण में उल्लेखित किया गया है) यह प्रमाणित करता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने भी राजा रावण को अत्यंत बुद्धिमान विद्वान की ख्याति प्रदान की है ऐसे महान राजा का पुतला वहन करना उचित नहीं है राजा रावण युद्ध में मर्यादा पुरुषोत्तम राम से पराजित हुए एवं श्रीराम द्वारा उनके प्राण लिए गए परंतु आज कलियुग में हर एक व्यक्ति स्वयं को राम समझ कर राजा रावण का पुतला दहन कर रहा है एसी प्रथा को रोकना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि राजा रावण हमारे पूर्वज है और हम अपने पूर्वजों का पुतला दहन करना या उनको जलाने की परंपरा बर्दाश्त करने योग्य नहीं है, साथ ही साथ से आपको यह अवगत कराना है की दशहरा पर्व अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है वह इसी दिन माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था व द्वापर में महाभारत काल में पाण्डवों का वनवास बात समाप्त हुआ था और वह नौ नए उत्पत्ति हुई अपने शस्त्रों को धारण किया था एवं शिव पुराण के अनुसार उक्त स्थिति को माता सती भगवान शिव के प्रति अनादर भावों को देखते हुए अपने पिता दक्ष के यज्ञ कुंड में समा गयी थी इसलिए दशहरा मात्र राजा रावण व उनके भाइयों को दहन करने के उद्देश्य से मनाया जाना उचित नहीं है और न ही इस कलयुग में कोई ऐसा व्यक्ति दिखाई पड़ता है जिसको हम मर्यादा पुरुषोत्तम राम उपाधि दे सके उक्त प्रथा संपूर्ण त्यागी भूमिहार ब्राह्मण समाज की भावनाओं को आहत करने का कार्य कर रही है यह परंपरा समाज में वैमनस्य,
फैलाने का कार्य कर रही है, अगर महिला उत्पीड़न चेतना के रूप मे किसी का पुतला पुतला फूँका ही है तो दुर्योधन,दुशासन व उनके सौ भाइयों का पुतला भी फूँका जाना चाहिए क्योंकि उक्त से बड़ा कोई भी महिला अत्याचारी वह महिलाओं के प्रति घृणा रखने वाली मानसिकता को दर्शाने वाला चेहरा कोई और नहीं हो सकता है।

