मुजफ्फरनगर। केंद्रीय मंत्री डॉ संजीव बालियान के बेहद करीबी, एक समाचार पत्र के प्रधान संपादक, विभिन्न सामाजिक गैर राजनीतिक संगठनों से जुड़े रहे और अब हरियाणवी फिल्मों में अभिनय करने वाले विकास बालियान का कहना है कि जिसे सौगात समझ गया था वह तो सांसत बन गया।
उनका कहना है कि कई बार दूर के ढोल सुहावने होते हैं, तो कई बार अच्छे के लिए किए गए प्रयास बड़ा बुरा परिणाम लेकर आ जाते हैं।
ऐसा ही कुछ मुजफ्फरनगर से सांसद और केंद्रीय मंत्री डॉ संजीव बालियान के प्रयासों से मुजफ्फरनगर जनपद के एनसीआर में आने के मामले को लेकर हुआ।

फोटो-विकास बालियान
विकास बालियान कहते है की एनसीआर एक ऐसा आकर्षक शब्द था, जिसके बारे में कल्पना यही थी कि एनसीआर क्षेत्र में आ जाने से मुजफ्फरनगर का कायाकल्प हो जाएगा और तमाम सुविधाएं यहां के लोगों को मिलने लगेगी। उनका जीवन, सड़के, चौराहे विद्युत व्यवस्था, प्रत्येक समान, मकान, दुकान आदि पर ईएमआई की सुविधा आदि नोएडा, गुड़गांव सरीखी हो जाएंगी। यहां के लोग, स्कूल, कोलिज, शिक्षा, कोचिंग कुछ विशिष्ट हो जाएंगी।
मगर जैसे एनसीआर क्षेत्र में मुजफ्फरनगर आया और उसके बाद यहां के लोगों को सुविधा तो कुछ नहीं मिली परंतु एनसीआर में आने के बाद उनके डीजल वाहनों, ट्रेक्टर, ट्रक , बस की एकाएक 5 साल उम्र कम हो गई। पर्यावरण प्रदूषण के नाम पर क्षेत्र के उद्योगों को पलीता लगने लगा। वही मेडिकल पॉलिसी से लेकर दूसरी कई चीजे अचानक ही महंगी हो गई तो लोगों को अनुभव हुआ कि दूर के ढोल सुहावने थे वह लोग उनका जीवन, सुविधाएं पहले ही अच्छे और बेहतर थे जब एनसीआर में नहीं आए थे। एनसीआर में आने के बाद अजीज आ चुके लोगों को अब एक उम्मीद की किरण नजर आ रही है और इसके लिए केंद्रीय मंत्री डॉ संजीव बालियान को धन्यवाद भी लोग देने लगे हैं।
की मंत्री जी हमें बस अभी एनसीआर से बचाओ इसे हमसे दूर ले जाओ, बहुत दूर ले जाओ।
जी हां! 8 बरस पहले जिस मुजफ्फरनगर को एनसीआर में शामिल किया गया था और जनपद वासियों को एक बहुत बड़ी सौगात लगी थी।
लेकिन समय गुजारने के साथ-साथ यह समझ में आने लगा था कि एनसीआर में आना जनपद वासियों के लिए सुखद नहीं बल्कि दुखद हो गया है।
एनसीआर में आने और एनजीटी के बार बार के आदेश निर्देश के बाद यहां उद्योगों को समय-समय पर प्रदूषण के चलते बंद करना पड़ रहा था।
वाहन स्वामियों के लिए तो अचानक ही अजीब सी स्थिति आ गई थी। एनसीआर में आने के बाद डीजल वाहनों की आयु 15 के स्थान पर 10 वर्ष कर दी गई थी।
इसका सबसे बड़ा खामियाजा निजी वाहनों और ट्रैक्टरों, ट्रक, बस स्वामियों को झेलना पड़ रहा था। 25- 25 लाख रुपए के वाहन दो दो, तीन तीन लाख रुपए में बेचने पड़ रहे थे।
वही स्कूल वाहनों की तो और भी बुरी स्थिति हो गई थी जो ज्यादा चलते ही नहीं थे मगर एनसीआर में आने के चलते उन्हें भी 10 साल पूरे होते ही कबाड़ में बेचना पड़ रहा था।
इसके साथ ही मेडिकल इंश्योरेंस और दूसरे इंश्योरेंस में भी प्रीमियम दरें बढ़ा दी गई थी, जबकि जोन थर्ड ही माना गया था।

केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ संजीव बालियान
एनसीआर में आने के बाद लोगों को ऋण आदि दूसरी चीजों का लाभ होने के स्थान पर नुकसान ही झेलना पड़ रहा था।
यह सब जानकारी केंद्रीय मंत्री डॉ संजीव बालियान को भी समय-समय पर हो रही थी।
आखिरकार उन्होंने मुजफ्फरनगर के 100 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी वाले हिस्से को एनसीआर क्षेत्र से बाहर निकलवाने का प्रयास किया।
जिसके बाद मुजफ्फरनगर सदर ब्लॉक, मोरना ब्लॉक, जानसठ ब्लॉक, पुरकाजी ब्लॉक, चरथावल क्षेत्र के एनसीआर से बाहर होने की संभावनाएं बन रही है। इस पर कार्य चल रहा है। एक बार एनसीआर से यह क्षेत्र बाहर आ गया तो उद्योगों को, वाहनों को और दूसरे अन्य कई चीजों को अत्यंत लाभ होगा।

विकास बालियान का कहना है कि वह तो लगातार इस विषय पर विगत कई वर्षों से लिखने आ रहे हैं। उन्हें तो स्वम इस एनसीआर ने कार से बे- कार भी किया। और अन्य कई घाटे भी पहुंचाएं। स्कूल वाहन भी कबाड़ की दर में बेचने पड़े।
उनका कहना है कि देर आए दुरुस्त आए अब तो अच्छा यही है कि एनसीआर से यह क्षेत्र बाहर निकल ही जाए।

