केरल हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: देवताओं और शहीदों के नाम पर ली गई शपथ अमान्य, 20 बीजेपी और 1 कांग्रेस जनप्रतिनिधि को दोबारा शपथ लेने का आदेश
केरल हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों द्वारा ली जाने वाली शपथ पूरी तरह कानून में निर्धारित प्रारूप के अनुसार ही होनी चाहिए। अदालत ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम के 20 बीजेपी पार्षदों और एक कांग्रेस जनप्रतिनिधि की शपथ को अमान्य घोषित करते हुए उन्हें दोबारा शपथ लेने का निर्देश दिया है।
यह मामला उस समय सामने आया जब स्थानीय निकाय चुनाव के बाद कुछ निर्वाचित प्रतिनिधियों ने शपथ ग्रहण के दौरान निर्धारित प्रारूप से हटकर अपने-अपने धार्मिक, सांस्कृतिक और वैचारिक संदर्भों का उल्लेख किया। आरोप था कि कुछ पार्षदों ने शपथ लेते समय विभिन्न देवी-देवताओं, भारत माता, शहीदों और अन्य प्रतीकों का नाम लिया, जबकि एक कांग्रेस प्रतिनिधि ने भी निर्धारित प्रारूप से अलग शब्दों का प्रयोग किया।
मामले को लेकर अदालत में याचिका दायर की गई, जिसमें कहा गया कि शपथ की प्रक्रिया संविधान और कानून द्वारा नियंत्रित होती है तथा इसमें किसी भी प्रकार का बदलाव या अतिरिक्त शब्द जोड़ना नियमों के विरुद्ध है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यदि जनप्रतिनिधियों को अपनी व्यक्तिगत आस्था या राजनीतिक विचारधारा के अनुसार शपथ में बदलाव की अनुमति दी जाए तो भविष्य में शपथ की एकरूपता और वैधानिकता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने संबंधित कानूनों और शपथ के निर्धारित प्रारूप का अध्ययन किया। अदालत ने माना कि कानून जनप्रतिनिधियों को केवल निर्धारित शब्दों के माध्यम से ही शपथ लेने की अनुमति देता है। यदि कोई व्यक्ति ईश्वर के नाम पर शपथ लेना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है, जबकि दूसरा विकल्प प्रतिज्ञान का होता है। लेकिन इसके अतिरिक्त किसी विशेष देवी-देवता, महापुरुष, शहीद, संगठन, आंदोलन या राजनीतिक विचारधारा का उल्लेख करना कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं माना जा सकता।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि शपथ केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति सार्वजनिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है। इसलिए इसका स्वरूप व्यक्तिगत भावनाओं, राजनीतिक विचारों या धार्मिक मान्यताओं के आधार पर बदला नहीं जा सकता।
फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि अदालत किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था या वैचारिक स्वतंत्रता पर टिप्पणी नहीं कर रही है। प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था के अनुसार जीवन जीने का पूरा अधिकार है, लेकिन जब कोई व्यक्ति संवैधानिक या वैधानिक पद ग्रहण करता है तो उसे कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करना अनिवार्य होता है।
इस निर्णय के बाद संबंधित जनप्रतिनिधियों को दोबारा निर्धारित प्रारूप में शपथ लेने के निर्देश दिए गए हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में देशभर के स्थानीय निकायों और अन्य निर्वाचित संस्थाओं के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। इससे यह संदेश गया है कि संवैधानिक प्रक्रियाओं में व्यक्तिगत या राजनीतिक प्रतीकों को शामिल करने की सीमा तय है और कानून के निर्धारित ढांचे का पालन सर्वोपरि है।
राजनीतिक हलकों में भी इस फैसले को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कुछ लोग इसे कानून के शासन और संवैधानिक मर्यादा को मजबूत करने वाला निर्णय बता रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि शपथ के दौरान व्यक्त की गई व्यक्तिगत आस्था को अलग नजरिए से भी देखा जाना चाहिए। हालांकि अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले का मूल प्रश्न केवल कानूनी वैधता का था, न कि किसी धर्म, विचारधारा या राजनीतिक दल की श्रेष्ठता का।
फिलहाल, हाई कोर्ट के इस फैसले को केरल की राजनीति और स्थानीय निकाय प्रशासन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है, जिसकी चर्चा राज्य के बाहर भी हो रही है। #AnujTyagiPost #RajsattaPost #KeralaNews

