टीएमसी में घमासान: बागी विधायकों ने ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाने का किया दावा, अभिषेक बनर्जी पर भी गिरी गाज

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में सोमवार को बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बागी खेमे ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खुला मोर्चा खोलते हुए दावा किया कि पार्टी के 60 विधायकों के समर्थन से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है, जबकि अभिषेक बनर्जी को महासचिव पद से निलंबित कर दिया गया है। इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।

बागी गुट की ओर से आयोजित बैठक में वरिष्ठ नेता अरूप रॉय को संगठन का नया अध्यक्ष घोषित किए जाने का दावा किया गया। वहीं बागी नेताओं का कहना है कि ममता बनर्जी को पार्टी की “मुख्य सलाहकार” की भूमिका दी जा सकती है, लेकिन संगठनात्मक फैसले अब नए नेतृत्व के तहत लिए जाएंगे।

दरअसल, टीएमसी के भीतर पिछले कई सप्ताह से असंतोष की स्थिति बनी हुई है। जून की शुरुआत में बड़ी संख्या में विधायकों ने पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठाए थे। इसके बाद पार्टी के भीतर खुलकर बगावत देखने को मिली। बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में करीब 58 से 60 विधायकों ने अलग लाइन अपनाई और विधानसभा में भी अपनी ताकत दिखाने का प्रयास किया।

राजनीतिक संकट इतना बढ़ गया कि टीएमसी नेतृत्व को जून के पहले सप्ताह में पार्टी की सभी समितियों और फ्रंटल संगठनों को भंग करने का फैसला लेना पड़ा। उस समय पार्टी ने संगठन के पुनर्गठन और आत्ममंथन की बात कही थी। इस फैसले के बाद तकनीकी रूप से पार्टी के सभी प्रमुख पद समाप्त हो गए थे, जिनमें ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के पद भी शामिल थे।

बागी गुट का आरोप है कि पार्टी में निर्णय लेने की प्रक्रिया कुछ लोगों तक सीमित हो गई थी और संगठन में असंतोष लगातार बढ़ रहा था। दूसरी ओर ममता बनर्जी समर्थक गुट लगातार इस बगावत को अस्वीकार करता रहा है और पार्टी की वैधता को लेकर संवैधानिक एवं कानूनी लड़ाई भी जारी है।

इस बीच लोकसभा और विधानसभा दोनों स्तरों पर टीएमसी के भीतर शक्ति परीक्षण की स्थिति बनी हुई है। पार्टी के आधिकारिक गुट ने बागी सांसदों और विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है, जबकि बागी खेमा खुद को “वास्तविक तृणमूल कांग्रेस” बताने का प्रयास कर रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह टूट औपचारिक रूप से आगे बढ़ती है तो यह टीएमसी के 28 वर्ष के इतिहास का सबसे बड़ा संगठनात्मक संकट साबित हो सकता है। आने वाले दिनों में विधानसभा, चुनाव आयोग और संसद स्तर पर इस विवाद के असर देखने को मिल सकते हैं।

फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति की निगाहें ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और बागी गुट के अगले कदम पर टिकी हुई हैं। यह घटनाक्रम केवल टीएमसी के भविष्य को ही नहीं बल्कि राज्य की पूरी राजनीतिक दिशा को भी प्रभावित कर सकता है।

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