बहुत मित्र पूछते है मैं अपने फ़ोन पर WhatsApp, Facebook या गूगल इत्यादि के कोई ऐप प्रयोग क्यूँ नहीं करता तो आपको एक रोचक किस्सा सुनाता हूँ और क्यूँकि मैं स्वयं साइबर सिक्योरिटी प्रोफेशनल हूँ तो मेरे लिए ये सब और भी रोचक हो जाता है।

वर्ष 2010 में दुनिया ने शायद पहली बार देखा होगा कि युद्ध सिर्फ बम और मिसाइल से नहीं बल्कि कंप्यूटर्स से भी लड़े जा सकते है।

ईरान का परमाणु कार्यक्रम अचानक तकनीकी समस्याओं में फंस गया। सेंट्रीफ्यूज खुद-ब-खुद डैमेज होने लगीं। वैज्ञानिक दंग रह गए। कारण? एक बेहद जटिल मालवेयर Stuxnet, जो औद्योगिक मशीनों को नियंत्रित करता और उन्हें धीरे-धीरे डैमेज कर देता।

दुनिया ने समझा: अब कोड भी हथियार बन सकता है।

आज, करीब डेढ़ दशक बाद, इज़राइल ने यह कौशल और भी उन्नत स्तर पर दिखा दिया।

चोरी छिपे ख़बरें आ रही है कि इस बार इज़राइल ने ईरान के शहरों में लगे ट्रैफिक कैमरा नेटवर्क को हैक कर लिया। उन्होंने ट्रैफ़िक कैमरा, मोबाइल नेटवर्क और सड़क किनारे पड़ी नेटवर्क केबल्स तक को टारगेट कर हजारों कैमरों, मोबाइल नेटवर्क, सड़क किनारे पड़े नेटवर्क केबल और सेंसरों के जरिए धीरे-धीरे शहरों का “pattern of life” तैयार कर यह पता लगाया कि कौन कब कहाँ जाता है, सुरक्षा काफिले कैसे चलते हैं, किन मार्गों पर सुरक्षा कमजोर होती है और किस किस लोकेशन पर कौन कब कब कितनी देर रुकता है।

बस इतना ही नहीं। इस डेटा का इस्तेमाल करके, इज़राइल ने reportedly ईरानी नेतृत्व के ठिकानों, सुरक्षा रूटों और मूवमेंट पैटर्न को ट्रैक किया और इस जानकारी के आधार पर उन्होंने खेमनाई को उड़ाने की पूरी योजना बनाई और सही समय का इंतज़ार किया।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो सिस्टम आम लोगों की निगरानी और उनके नियंत्रण के लिए बनाया गया था, वही सिस्टम ईरान के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बन गया।

और यही है साइबर युद्ध का भविष्य..
जहाँ हर कैमरा, मोबाइल फ़ोन, सड़कों पर पड़ी नेटवर्क केबल्स, फ़ोन के टावर्स और आपके फ़ोन मे इनस्टॉल हुई ढेर सारी एप्लिकेशंस आपके या देश के ख़िलाफ़ सटीक निशाना बनने के लिए प्रयोग हो सकती है।

अभी के लिए सिर्फ़ इतना ही…

अगर आपको ये जानना है कि 2010 मे क्या हुआ था, pls let me know, I will write another post about it.

जय श्री राम।

पुष्पेंद्र राठी,गांव शाहड़बर जनपद मुज़फ्फरनगर

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