हल्द्वानी। पृथ्वी के मेसोजोइक युग यानी डायनासोर के कालखंड से जुड़ी ‘हरियाली’ को अब लोग हल्द्वानी में भी देख सकेंगे। वन अनुसंधान ने राज्य का पहला साइकैड गार्डन तैयार किया है। जिसमें इस पादप समूह की 31 प्रजातियों को संरक्षित किया गया है।
खास बात ये है कि इसमें से 17 प्रजाति इंटरनेशनल यूनियन फार कंजर्वेशन आफ नेचर की ओर से संकटग्रस्त श्रेणी में डाली गई हैं।

उत्तराखंड वन अनुसंधान के मुख्य वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी के अनुसार गार्डन की स्थापना का उद्देश्य साइकैड्स प्रजातियों के संरक्षण, इनके विकास क्रम को समझना और जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रभावों पर अध्ययन करना है। इस विषय में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को एक ही जगह पर इनके बारे में जानकारी भी मिल जाएगी।

वन अनुसंधान की ओर से जैव विविधता के संरक्षण, दुर्लभ और संकटग्रस्त वनस्पतियों को बचाने के साथ ही मृदा परीक्षण के माध्यम से वानिकी से जुड़े शोध अक्सर किए जाते हैं। इसी के तहत रामपुर रोड स्थित वन अनुसंधान मुख्यालय के परिसर से जुड़ी दो एकड़ भूमि पर साइकैड गार्डन विकसित करने की योजना बनाई गई। इससे पूर्व उत्तर भारत में राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान लखनऊ में ही इस तरह का उद्यान बनाया गया था।

वहीं, सीसीएफ संजीव चतुर्वेदी ने बताया कि साइकैड्स पृथ्वी पर सबसे अधिक संकटाग्रस्त पौधों के समूहों में से एक हैं। और ये मेसोज़ोइक युग से मौजूद है। मेसोजोइक युग करीब 252 मिलियन वर्ष पहले शुरू होकर 66 मिलियन वर्ष पूर्व समाप्त हो गया था। उस समय पृथ्वी पर डायनोसर मौजूद होने के कारण इन्हें उस विशालकाय सरीसृप प्रजाति के कालखंड से भी जोड़ा जाता है।

हल्द्वानी में साइकैड की साइकस एंडमानिका, साइकस बेडोमी, साइकस जेलेनिका, साइकस पेक्टिनाटा और साइकस सिरसनलिस आदि प्रजाति देखने को मिलेगी। चतुर्वेदी के अनुसार सजावट के तौर पर पहचान होने के कारण भी साइकैड्स प्रजातियों को विदोहन और संकट के दौर से गुजरना पड़ रहा है। यही वजह है कि इस पादप समूह के संरक्षण का फैसला लिया गया।

धीमी वृद्धि दर लेकिन लंबे समय तक जीवित

वन अनुसंधान के अनुसार साइकैड्स से जुड़ी वनस्पति प्रजातियां अन्य के मुकाबले धीमी गति से बढ़ते हैं। लेकिन लंबे समय तक जीवित रहने में सक्षम है। इनकी जड़ों में पाए जाने वाला कोरालाइड साइनो-बैक्टीरिया के साथ सहजीवी संबंध बनाकर वायुमंडल में नाइट्रोजन को स्थिर बनाए रखने में भी सहायक है।

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