लखनऊ। प्रदेश की खेती अब सिर्फ पेट भरने तक सीमित नहीं रह गई है। यह अब आमदनी, रोजगार और निर्यात का मजबूत जरिया बन रही है। प्रदेश में हर जिले में 1000 प्रसंस्करण इकाइयां बनाने की योजना शुरू हो गई है।
वहीं, बाराबंकी के त्रिवेदीगंज में इंडो-डच सेंटर फॉर एक्सीलेंस खोला जाएगा, जहां फूलों और सब्जियों की उन्नत खेती पर शोध और प्रशिक्षण दिया जाएगा। यह सेंटर नीदरलैंड के सहयोग से बनाया जाएगा। इसका मकसद फलों-सब्जियों के उत्पादन को वैज्ञानिक और निर्यात-योग्य बनाना है।
इसके साथ ही सरकार ने जेवर एयरपोर्ट के पास एक आधुनिक एक्सपोर्ट हब की योजना भी तैयार की है, ताकि यूपी के उत्पाद यूरोप और अमेरिका जैसे हाई स्टैंडर्ड बाजारों तक पहुंच सकें।
लखनऊ के नादरगंज औद्योगिक क्षेत्र में गामा रेडिएशन प्लांट तैयार हो चुका है। इससे फलों और सब्जियों को संक्रमण मुक्त किया जाएगा और उनकी शेल्फ लाइफ बढ़ाई जा सकेगी। प्रदेश में अब पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर वैज्ञानिक, श्रम-प्रधान और मुनाफे वाली खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।
इससे प्रच्छन्न बेरोजगारी में कमी आई है और किसानों की आमदनी भी बढ़ी है। सीआईआई के अध्यक्ष संजीव पुरी के मुताबिक, फलों और सब्जियों की खेती परंपरागत फसलों की तुलना में दो से ढाई गुना ज्यादा मुनाफा देती है। साथ ही यह श्रम-प्रधान होने के कारण बड़े पैमाने पर रोजगार भी पैदा करती है।

17 हजार से ज्यादा यूनिट्स तैयार

प्रदेश में अब तक 17,000 से अधिक प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित की जा चुकी हैं। प्रधानमंत्री खाद्य उन्नयन योजना के तहत यूनिट लगाने वालों को 35 प्रतिशत तक अनुदान और 30 लाख रुपये तक का कर्ज मिल रहा है।

यदि इकाई किसी महिला के नाम पर है और वह सोलर प्लांट लगाना चाहती है, तो सरकार 90 प्रतिशत तक सब्सिडी देती है। इन इकाइयों में नर्सरी, पौधरोपण, तुड़ाई, ग्रेडिंग, पैकिंग, लोडिंग, अनलोडिंग और विपणन जैसे कई कामों में रोजगार मिलेगा।

कोविड के बाद से लोगों में स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ी है, जिससे फल-सब्जियों की मांग तेजी से बढ़ी है। एसबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में प्रति व्यक्ति इनकी उपलब्धता सालाना 7 से 12 किलोग्राम तक बढ़ी है। उत्पादन और खपत दोनों मामलों में उत्तर प्रदेश देश में सबसे आगे है।

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