हापुड़। समाजवादी पार्टी सांसद रामजीलाल सुमन की राणा सांगा पर की गई टिप्पणी के बाद शुरू हुआ विवाद अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि अब बरेली के मौलाना तौकीर रजा ने उन्हें गद्दार बताकर विवाद को हवा दी है।
ये अलग बात है कि बाबरनामा को छोड़ दें तो कहीं भी राणा सांगा द्वारा बाबर से मदद मांगने का जिक्र नहीं मिलता है। इतिहासकारों का भी दावा है कि बाबर के भारत आने को लेकर किए गए दर्जनों शोध में से कोई भी सांसद के बयान की पुष्टि नहीं करता है।

देशभक्तों को बताया जाता है आतंकी

भारतीय इतिहास संकलन संघ के अध्यक्ष और मेरठ विश्श्वविद्यालय में इतिहास के विभागाध्यक्ष डा. विग्नेश त्यागी कहते हैं कि सपा सांसद का बयान बचकाना, मनमाना और तथ्यों को झुठलाने वाला है। इतिहास की जिस परंपरा में देशभक्तों को आतंकी बताया जाता है और आर्यों को बाहर से आया हुआ बताते हैं। रामजीलाल सुमन का बयान उसी विचारधारा का पोषक है। बाबर आततायी था, समलैंगिक था। वह भारत में ताउम्र रहना चाहता था, लेकिन यहां की मिट्टी में दफन होना उसको स्वीकार नहीं था। ऐसे बाबर से किसी भी राजपूत राजा का सानिध्य नहीं था।

1521 में भोजा में हुआ था युद्ध

बाबर द्वारा लिखित बाबरनामा के अतिरिक्त कोई इतिहासकार इससे सहमत नहीं है कि राणा गा ने उसको भारत आने का आमंत्रण दिया था। वरिष्ठ इतिहासकार और एसएसवी डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर डा. दीपक बैसला बताते हैं कि राणा सांगा और इब्राहिम लोदी में 1517 में बाजौर, 1519 में धौलपुर और 1521 में भोजा में युद्ध हुआ। तीनों में इब्राहिम लोदी को हार मिली। ऐसे में राणा सांगा खुद सक्षम होने के बावजूद बाबर को सहायता के लिए क्यों आमंत्रित करते।

आलम खां लोदी पाना चाहते थे सत्ता

दरअसल, इब्राहिम लोदी का चाचा दौलतखान लोदी और चचेरा भाई आलम खां लोदी सत्ता पाना चाहते थे। वह इब्राहिम लोदी को हराना चाहते थे। बाबर को उन दिनों फरगना से बाहर कर दिया गया था। वह बार-बार भारत पर आक्रमण कर रहा था। ऐसे में इब्राहिम लोदी को हराने के लिए ही आलम और दौलतखान ने मदद ली थी। यही इतिहास है, छात्रों को पढ़ाया भी यही जाता है और हिंदुस्तान की समकालीन व्यवस्था से मेल भी यही खाता है।

वरिष्ठ कवि डा. अर्जुन शिशौदिया बताते हैं कि राजपूत समाज के लिए उनका इतिहास ही चरित्र, देशभक्ति, ऊर्जा और मानवता है। हमारा इतिहास आगे बढ़ने की ऊर्जा देता है। यही कारण है कि राजपूत और देशभक्ति और मातृ भूमि पर मर-मिटने वाली संस्कृति पर जिंदा है। हमारी रानियों ने तीन-तीन जौहर देखे हैं, हमारे पूर्वजों के शरीर को टुकड़ों में काट डाला गया। ऐसे में कोई राजपूती चरित्र और देशभक्ति पर अंगुली उठाना ठीक नहीं है।

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