विवाह में होता था गंगा जल का उपयोग
यह श्रद्धालुओं की आस्था, गंगाजल का महत्व और इस मेला की भव्यता आज भी विश्व भर में भारतीय संस्कृति का गौरव बढ़ाते हैं। 17वीं सदी में भारत आए फ्रांसीसी यात्री टेवर्नियर के लेखों में गंगाजल को भारतीय समाज में अत्यधिक पवित्र और मूल्यवान बताया गया है। यह केवल जल नहीं था, बल्कि सामाजिक और धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था। उनके अनुसार, विवाह जैसे शुभ अवसरों पर गंगाजल का उपयोग होता था, जहां प्रत्येक अतिथि को एक या दो कप जल दिया जाता है।
ट्वेन ने 1894 के प्रयागराज कुंभ मेला का किया था दौरा
कभी-कभार इसकी मात्रा इतनी अधिक होती थी कि कभी-कभी एक शादी में 2,000 से 3,000 रुपये मूल्य का गंगाजल खर्च होता है। टेवर्नियर के इस विवरण का उल्लेख अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘फालोइंग द इक्वेटर : ए जर्नी एराउंड द वर्ल्ड ‘ के पृष्ठ संख्या 469-470 में किया है। मार्क ट्वेन ने 1894 के प्रयागराज कुंभ मेला का दौरा किया तथा इसमें शामिल अपार जनसमूह और उनकी अटूट आस्था पर गहरा प्रभाव महसूस किया।
अटूट श्रद्धा से आगे बढ़ते थे भक्त
प्रयाग-कुंभ का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा- मेले में भारत के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु आते थे। इनमें से कई महीनों तक तपती गर्मी और धूल में पैदल यात्रा करते हुए प्रयाग पहुंचते थे। वे थके, भूखे और कमजोर होते थे लेकिन उनकी अटूट श्रद्धा उन्हें आगे बढ़ने का संबल देती थी। गंगा और यमुना के संगम पर स्नान कर वे स्वयं को पापों से मुक्त मानते थे। उनकी इस अटूट आस्था और समर्पण ने मुझे अभिभूत कर दिया।
माघ मेले में हर साल 20 लाख श्रद्धालुओं के आने का उल्लेख
ट्वेन ने प्रयागराज के मेले में हर साल 20 लाख श्रद्धालुओं के आने का उल्लेख किया है। वह लिखते हैं कि हर 12वां वर्ष विशेष कृपा का वर्ष माना जाता है। उस वर्ष तीर्थयात्रियों की संख्या बहुत अधिक होती है। यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। उन्होंने पुस्तक में एक उल्लेखनीय किस्सा साझा किया कि भविष्य में गंगा की पवित्रता कुछ समय के लिए समाप्त होने की भविष्यवाणी की गई थी। यह भी कहा जाता है कि गंगा का केवल एक और 12वां वर्ष बचा है।
अब पवित्र नदी नहीं रहेगी गंगा
इसके बाद यह सबसे पवित्र नदी नहीं रहेगी और तीर्थयात्री इसे कई सदियों तक छोड़ देंगे। कितनी सदियों तक, इसका उल्लेख ज्ञानी लोग नहीं करते, उस अवधि के बाद यह फिर से पवित्र हो जाएगी। मार्क ट्वेन ने यह भी लिखा कि मेले के बाद बड़ी संख्या में लोग पवित्र गंगाजल लेकर अपने-अपने गांवों को लौटते थे। इस जल को देश के अन्य हिस्सों में ले जाकर बेचा जाता था। यह व्यापारिक और धार्मिक महत्व का अद्भुत संगम था।
आज करोड़ों में है गंगाजल की कीमत
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मध्यकालीन इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. हेरंब चतुर्वेदी ने फ्रांसीसी यात्री में टेवर्नियर के यात्रा वृत्तांत का उल्लेख अपनी पुस्तक मध्यकालीन भारत के विदेशी यात्री में किया है। वह कहते हैं कि तब आवागमन के साधन नहीं थे और यहां से गंगाजल ले जाना काफी मुश्किल था। उस कालखंड में विवाह समारोहों में दो से तीन हजार रुपये गंगाजल पर खर्च को आज से तुलना करें तो यह दो से तीन करोड़ रुपये होगा।

