“जज़्बातों की पहरेदारी”
जज़्बातों की पहरेदारी ये अखियाँ नहीं मानतीं। छलक उठतीं हैं जब-तब…सुख-दुख में फर्क नहीं पहचानतीं।। पर मन कायल होता है…
जनसरोकारों का अग्रदूत
जज़्बातों की पहरेदारी ये अखियाँ नहीं मानतीं। छलक उठतीं हैं जब-तब…सुख-दुख में फर्क नहीं पहचानतीं।। पर मन कायल होता है…
जब आच्छादित हो झीना दुशाला फिर मार्ग प्रशस्त नहीं हो पाता, बाधित करे दृष्टि, ऐसे आंचल को ओढ़ हृदय अकुलाता।…
शंकर से समाधिस्थ, हम भी बैठे थे कब से, वे हमारे जल, जंगल, जमीन सब कुछ लीलते गये एक चतुर…
एक ही पैर पर थिरकती झुक कर, कुछ तिरछी हो नृत्य की विभिन्न भंगिमाओं को निरंतर साधती अवनी, निशा दिवस…
तू अपनी खूबियां ढूंढ …. कमियां निकालने के लिए लोग हैं | अगर रखना ही है कदम…. तो आगे रख…
यूं ही नहीं मान्यता है बिंदी की, स्त्री में छुपे भद्रकाली के रूप को शांत करती है । यूं ही…
यदि पुरुष स्त्री को अपनी बाहों में लेना चाहता हैं, तो उसका तात्पर्य केवल वासना मात्र ही नहीं हो सकता…
ढूंढने से भी घर में नही मिलती तुम्हारी निशानिया होती भी कैसे यहां तुम तो मेरे दिल में कैद हो…
आज कितना काम किया। थक गई हूं। थोड़ी देर रिलेक्स कर लिया जाए। चाय बनाकर पी लेती हूं। थोड़ी भूख…
कहा जानता हूं… मैं प्रेम की परिभाषा नही हैं मेरे पास.. शब्दकोष प्रेम के ना प्रेम का कोई इतिहास तुम…