धर्मेंद्र मलिक: पीएचडी की संरचना में बदलाव जरूरी, शोध को उत्पाद, कृषि और समाज से जोड़ें

भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक ने देश में पीएचडी (डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी) की वर्तमान संरचना पर पुनर्विचार की आवश्यकता जताते हुए कहा कि शोध को उत्पाद विकास, कृषि और समुदाय की आवश्यकताओं से सीधे जोड़ा जाना चाहिए, ताकि उसका वास्तविक लाभ समाज तक पहुंच सके।

उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार “समृद्ध और महान भारत 2047” के तृतीय एवं अंतिम दिवस पर “शिक्षा के साथ नैतिक शिक्षा” विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली का सामुदायिक उपयोगिता से पर्याप्त संबंध स्थापित नहीं हो पाया है और शिक्षा को मुख्य रूप से रोजगारोन्मुख दृष्टिकोण से देखा जा रहा है।

धर्मेंद्र मलिक ने कहा कि इसके परिणामस्वरूप पीएचडी जैसे उच्च शोध कार्यक्रमों का सामाजिक प्रभाव सीमित रह गया है। उन्होंने चिंता जताई कि अनेक शोधार्थी पीएचडी पूर्ण करने के बाद नौकरी में चले जाते हैं, लेकिन उनके शोध प्रबंध (थीसिस) का व्यावहारिक उपयोग बहुत कम होता है। ऐसे शोध की प्रासंगिकता पर पुनर्विचार आवश्यक है।

उन्होंने सुझाव दिया कि पीएचडी की संरचना एवं मानदंडों में सुधार करते हुए शोध को प्रत्यक्ष रूप से उत्पाद विकास, कृषि प्रणालियों और स्थानीय समुदायों से जोड़ा जाए, ताकि शोध के परिणाम उद्योग, किसानों और समाज के लिए उपयोगी सिद्ध हों।

उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा के साथ नैतिक मूल्यों का समावेश अनिवार्य है। नैतिकता न केवल व्यक्तिगत विकास का आधार है, बल्कि संस्थागत मजबूती और सतत प्रगति के लिए भी आवश्यक है। “वसुधैव कुटुंबकम” की अवधारणा तभी साकार हो सकती है, जब विकास के अवसर और लाभ सभी को समान रूप से मिलें।

उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक शिक्षा, उद्यम और सामाजिक ढांचे में नैतिक मूल्यों का समुचित समावेश नहीं होगा, तब तक भारत का “विश्व गुरु” बनने का लक्ष्य अधूरा रहेगा। “समृद्ध और महान भारत 2047” का सपना भी तभी पूरा होगा, जब कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाते हुए प्रौद्योगिकी, सामाजिक ज्ञान, पर्यावरणीय सिद्धांतों और शोध का समन्वित उपयोग किया जाए।

इस अवसर पर आचार्य बालकृष्ण, एस एन सचदेवा और डॉ तृप्ता ठाकुर सहित कई विशेषज्ञों ने भी अपने विचार रखे।

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