लखनऊ। नर्सिंग छात्रा के सांस लेने व चेस्ट पेन की परेशानी का राममनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज में सही से इलाज न होने का मामला सामने आया है। छात्रा को टीबी व लीवर में समस्या थी। डाक्टराें ने इसकी जांच तक नहीं कराई। बीमारी के दौरान ही कोरोना का विकट दौर आया, उसके बाद छात्रा की हालत इतनी बिगड़ी कि अस्पताल में भर्ती रहने के बाद भी उसकी जान नहीं बच सकी। फोरम ने एकपक्षीय आदेश में अस्पताल प्रशासन को पिता को 25 लाख रुपये हर्जाना देने का आदेश दिया है।
आपको बता दें कि इस मामले में लोहिया अस्पताल के तत्कालीन निदेशक सहित 11 चिकित्सकों व अन्य स्टाफ काे आरोपित किया गया है। आदिल नगर, विकास नगर निवासी जितेंद्र बहादुर सिंह की बेटी को सांस लेने व चेस्ट पेन की समस्या हुई, नर्सिंग छात्रा को 30 जनवरी 2020 को राममनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज की इमरजेंसी में डिपार्टमेंट आफ मेडिसिन के डा. संदीप चौधरी को दिखाया गया। डाक्टर ने पेट में गैस की समस्या बताकर कुछ दवाइयां देकर ओपीडी के लिए रेफर कर दिया।
लाकडाउन के चलते नहीं पहुंच सकी अस्पताल
लाकडाउन के चलते नहीं पहुंच सकी अस्पताल
31 जनवरी को डाक्टर ने ओपीडी में जांच करके ब्लड टेस्ट व अन्य जांचें कराईं। आरोप है कि मरीज की जांच रिपोर्ट को डाक्टर ने सही से नहीं पढ़ा, लीवर डैमेज व टीबी के लक्षण थे लेकिन टीबी की जांच नहीं कराई गई। इससे मरीज को तकलीफ बनी रही, वह फरवरी व मार्च में भी डाक्टर को दिखाने अस्पताल गई। 23 मार्च 2020 को लाकडाउन की वजह से अस्पताल में जांच नहीं कराने नहीं पहुंच सकी।
इलाज पर 1.61 करोड़ किया खर्च
पिता जितेंद्र एक अक्टूबर को फिर बेटी को लेकर लोहिया संस्थान पहुंचे और डा. रईश खान को दिखाया। डा. खान ने भी टीबी का लक्षण होने के बाद भी उसका इलाज नहीं कराया। मरीज की समस्या बनी रही। आखिरकार 26 अक्टूबर 2020 को नर्सिंग छात्रा की मौत हो गई। पिता ने आरोप लगाया कि बेटी का सही तरीके से इलाज नहीं किया गया जिससे उसकी मौत हो गई। जितेंद्र ने जिला उपभोक्ता फोरम द्वितीय में वाद दाखिल किया कि बेटी के इलाज पर 1.61 करोड़ रुपये खर्च किया, उन्हें धनराशि दिलाई जाए।
अस्पताल में नहीं मिला इलाज
फोरम के अध्यक्ष अमरजीत त्रिपाठी, सदस्य प्रतिभा सिंह ने प्रकरण की सुनवाई की। उन्होंने Supreme Court के आदेश का उल्लेख करते हुए लिखा कि अस्पताल ने जांच व इलाज में मानकों का पालन नहीं किया। अस्पताल में भर्ती रहने के बाद भी मरीज की हालत कंट्रोल से बाहर हो गई। पिता क्षतिपूर्ति पाने का हकदार है, मृत छात्रा नर्सिंग की पढ़ाई कर रही थी। एकपक्षीय निर्णय में पिता को 30 दिन में 25 लाख हर्जाना देने का आदेश दिया है। यह धन आरोपित अकेले या मिलकर दे सकते हैं। तय समय के बाद 9 प्रतिशत ब्याज व वाद व्यय 10 हजार रुपये देना होगा।
वहीं लोहिया संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक एवं जनरल मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष प्रो. विक्रम सिंह ने बताया कि मुझे ऐसे किसी आदेश की जानकारी नहीं है। संस्थान में आने वाले सभी मरीजों को इलाज मुहैया कराया जाता है। परिवारीजन ने कभी मुझसे न मुलाकात की और न ही मरीज के इलाज में लापरवाही की शिकायत की गई। जिला उपभोक्ता फोरम का आदेश मिलने के बाद ही कुछ बता पाएंगे।
पिता जितेंद्र एक अक्टूबर को फिर बेटी को लेकर लोहिया संस्थान पहुंचे और डा. रईश खान को दिखाया। डा. खान ने भी टीबी का लक्षण होने के बाद भी उसका इलाज नहीं कराया। मरीज की समस्या बनी रही। आखिरकार 26 अक्टूबर 2020 को नर्सिंग छात्रा की मौत हो गई। पिता ने आरोप लगाया कि बेटी का सही तरीके से इलाज नहीं किया गया जिससे उसकी मौत हो गई। जितेंद्र ने जिला उपभोक्ता फोरम द्वितीय में वाद दाखिल किया कि बेटी के इलाज पर 1.61 करोड़ रुपये खर्च किया, उन्हें धनराशि दिलाई जाए।
अस्पताल में नहीं मिला इलाज
फोरम के अध्यक्ष अमरजीत त्रिपाठी, सदस्य प्रतिभा सिंह ने प्रकरण की सुनवाई की। उन्होंने Supreme Court के आदेश का उल्लेख करते हुए लिखा कि अस्पताल ने जांच व इलाज में मानकों का पालन नहीं किया। अस्पताल में भर्ती रहने के बाद भी मरीज की हालत कंट्रोल से बाहर हो गई। पिता क्षतिपूर्ति पाने का हकदार है, मृत छात्रा नर्सिंग की पढ़ाई कर रही थी। एकपक्षीय निर्णय में पिता को 30 दिन में 25 लाख हर्जाना देने का आदेश दिया है। यह धन आरोपित अकेले या मिलकर दे सकते हैं। तय समय के बाद 9 प्रतिशत ब्याज व वाद व्यय 10 हजार रुपये देना होगा।
वहीं लोहिया संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक एवं जनरल मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष प्रो. विक्रम सिंह ने बताया कि मुझे ऐसे किसी आदेश की जानकारी नहीं है। संस्थान में आने वाले सभी मरीजों को इलाज मुहैया कराया जाता है। परिवारीजन ने कभी मुझसे न मुलाकात की और न ही मरीज के इलाज में लापरवाही की शिकायत की गई। जिला उपभोक्ता फोरम का आदेश मिलने के बाद ही कुछ बता पाएंगे।

