हिन्दू और सिख धर्म दोनों सनातन संस्कृति का ही हिस्सा हैं-अशोक बालियान, चेयरमैन, पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन
सिख परंपरा के अनुसार, सिख धर्म की स्थापना गुरु नानक (1469-1539) द्वारा की गई थी और बाद में नौ अन्य गुरुओं ने इसका नेतृत्व किया था। 10वें गुरु गोबिंद सिंह (1666-1708) की मृत्यु के बाद सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ “गुरु ग्रंथ साहिब” को एकमात्र पवित्र ग्रंथ माना गया है।
सिखों के चौथे गुरू रामदास जी ने स्वर्ण मंदिर की सन 1577 में नींव रखी थी। और पांचवें गुरु अर्जन देव ने मंदिर की स्थापना की थी। इसके निर्माण के बाद गुरु अर्जन ने सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ को स्थापित किया था। मंदिर में अकाल तख्त भी मौजूद है जो ‘छठे गुरु का सिंहासन कहा जाता है। यह छठे गुरु ‘गुरु हरगोबिंद’ द्वारा बनवाया गया था। सिखों और मुगलों के बीच लंबे समय से चले विवाद के बाद सन 1762 में मंदिर ध्वस्त हो गया था।
प्राचीन भारत में ईश्वर के रूप में एक सर्वोच्च शक्ति की पूजा किया करते थे। और प्रकृति की भिन्न-भिन्न शक्तियों में ईश्वर के विभिन्न रूपों की कल्पना कर के देवताओं के रूप में उनकी भी उपासना करते थे। गुरु नानक भक्ति आंदोलन और हिंदू धर्म के वैष्णव मत से भी प्रभावित थे। वैष्णव के बहुत से उप संप्रदाय जैसे बैरागी, दास, रामानंद हैं। सिख गुरु हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा करते थे और तीर्थाटन करते थे। गुरु नानक अयोध्या सहित पूरे देश के हिन्दू तीर्थों के यात्रा पर निकले थे। गुरु ग्रंथ साहिब में भगवान श्रीराम और उनकी कथा का जिक्र है। हिंदू धर्म की एक शाखा के रूप में यह पंत विकसित हुआ था। हिन्दू धर्म से बौद्ध, जैन और सिख सहित कई संप्रदाय निकले और सब के सब यहीं समाहित हुए है। इसीलिए बौद्ध, जैन और सिख खुद को सनातन धर्म का अंग मानते है
दो सिख गुरुओं गुरु अर्जुन देव और गुरु तेग बहादुर द्वारा इस्लामिक धर्मांतरण से मना करने पर मुगल शासकों द्वारा उन्हें प्रताड़ित किया गया था और बाद में उनकी हत्या कर दी गयी थी। इस्लामिक युग में उत्तर भारत में हिन्दुओं के धर्मांतरण को रोकने के लिए गुरु गोविंद सिंह ने सन 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की थी, जो सैनिक व संतों का समहू था। गुरु गोविंद सिंह के पिता गुरु तेग बहादुर नौवें सिख गुरु थे, जिनकी इस्लामी आक्रांताओं ने हत्या कर दी थी।
इससे पहले देश में पहले विजयनगर साम्राज्य, मराठे, राजपूत साम्राज्य और दक्षिण भारत के साम्राज्यों ने हिन्दू अस्मिता को जिंदा रखा था। सिक्ख धर्म की शुरुआत भी हिन्दुओं के सैन्य संगठन के रूप में हुई थी। भारत में मुस्लिम आक्रांताओ का सामना लम्बे समय तक गुर्जर-प्रतिहार राजाओ ने किया था। उत्तर भारत सहित अनेकों रजवाड़ों में जाट, राजपूत, मराठे और सिक्ख जैसी शक्ति औरगजेब के उत्पीडन के खिलाफ विद्रोह के रूप में भी उभरी थी।
सिख धर्म में केवल गुरु ग्रंथ साहिब का एक संरक्षक होता है जिसे ‘ग्रंथी’ कहते हैं और कोई भी सिख गुरुद्वारा में या अपने घर में गुरु ग्रंथ साहिब के पाठ के लिये स्वतंत्र है। सभी धर्मों के लोग गुरुद्वारा जा सकते हैं। प्रायः प्रत्येक गुरुद्वारे में एक निःशुल्क सामुदायिक रसोई होती है जहाँ सभी धर्मों के लोगों को भोजन परोसा जाता है।
भारत से पंजाब के लिए एक अलग राज्य के लिए अभियान चलाने वाले अमेरिका स्थित “सिख फॉर जस्टिस” समूह की योजना अनेकों बार विफल हो चुकी है। क्योकि “सिख फॉर जस्टिस” समूह के नेता गुरपतवंत पन्नू की इस अपील को भारत के पंथक सिख संगठनों और धार्मिक संगठनों ने खारिज कर दिया था।
पंजाब में 90 के दशक में जरनैल सिंह भिंडरावाले ने पंजाब में खालिस्तान की मांग की और उसके आदेश पर हिन्दुओं व निर्दोष सिखों की हत्याओं का दौर शुरू हो गया था। पंजाब पुलिस के डीआईजी अवतार सिंह अटवाल की स्वर्ण मन्दिर की सीढियों पर भिंडरावाले के हथियार बंद लोगो ने हत्या कर दी थी उसके बाद पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री दरबारा सिंह ने जत्थेदार जरनैल सिंह भिंडरावाले से टेलीफोन पर बात करके, पुलिस अफसर डीआईजी अवतार सिंह अटवाल का शव मौके से उठा लेने देने की इजाजत मांगी थी।
पंजाब में अत्यधिक हिंसा होने पर भारत सरकार ने स्वर्ण मन्दिर को आतकवादियों से खाली कराने के लिए सेना को भेजने का आदेश दिया था। सेना द्वारा स्वर्ण मन्दिर की घेरा बंदी के शुरुआत में 2 जून 1884 को ब्रिटिश पत्रकार मार्क टली की जरनैल सिंह भिंडरावाले से आख़िरी मुलाक़ात हुई थी। मार्क टली अपनी क़िताब ‘अमृतसर मिसेज़ गाँधीज़ लास्ट बैटल’ लिखते हैं कि उस दिन भिंडरांवाले सहज नहीं दिख रहे थे।
जाने-माने फोटोग्राफर रघु राय ने भी ब्रिटिश पत्रकार मार्क टली के साथ ही भिंडरावाले की तस्वीर ली थी, उस समय भिंडरावाले का चेहरा पर गुस्से, डर और तनाव का भाव था। जिस वक्तत यह तस्वीर ली गई थी, उस समय जरनैल सिंह भिंडरावाले स्वतर्ण मंदिर के एक कमरे में चारपाई पर अकेला बैठा था। सेना द्वारा चलाये गए ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ में 6 जून 1984 को भिंडरावाले को मार दिया गया था।
इस समय सिख अलगाववादी अमृतपाल सिंह खुद को खालिस्तानी आतंकी जनरैल सिंह भिंडरावाले का अनुयायी होने का दावा करता है। पंजाब में अमृतपाल सिंह की गतिविधियों को देखकर लगता है कि भिंडरावाले के समय का दौर शुरू हो सकता है, जिसे समय रहते रोका जाना चाहिए। लेकिन पंजाब सरकर ये सब कुछ होते देख रही है।
जरनैल सिंह भिंडरावाले के दौर में भी उस वक्त के हुक्मरानों-नेताओं के दिमाग में एक गलतफहमी थी कि वे सिखों को इस काम के लिए (खालिस्तान राज्य बनाने के लिए) धीरे-धीरे आगे बढ़ने देंगे, अगर कहीं ज्यादा गड़बड़ होती दिखी तो, तुरंत उस पर ब्रेक लगा दिया जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं था।
गुरु नानक ने जहाँ भारतीय ऋषि परंपरा को ही आगे बढ़ाया, वहीं दशम गुरु गोविंद सिंह ने रामायण को अपने तरीके से लिखा था। गुरु गोविंद सिंह माँ भगवती की पूजा भी करते थे। गुरू गोविंद सिंह जी ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए खालसा पंथ की स्थापना की थी। सिख गुरु हिंदू परिवारों में पैदा हुए और गुरु नानक जी के दिखाए रास्ते पर चले। गुरु गोविंद सिंह जी ने जो ‘पंज प्यारे’ चुने थे और जिन्हें सिख होने का आशीर्वाद दिया था, वे सभी देश के विभिन्न क्षेत्रों के हिंदू थे। उस दौर में प्रत्येक हिंदू परिवार ने एक बेटे को सिख बनाने के लिए दिया था, ताकि मुगल आक्रांताओं के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सके।
भारत को खंडित कर के पंजाब को अलग मुल्क बनाने का दिवास्वप्न लेकर चले इन खालिस्तानी आतंकियों के नेटवर्क पाकिस्तान से लेकर कनाडा तक हैं और इसका इस्तेमाल वो भारत के खिलाफ सिखों को भड़काने के लिए करते हैं। जबकि हिन्दू और सिख धर्म सनातन संस्कृति का ही हिस्सा हैं। देश को विभाजित करने की सोच करने वाली ताकतों को समय रहते कुचलना होगा।

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