विजय तुम्हारी होगी ……..

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जग निर्णायक बनकर जब-जब, दोष मढ़ेगा तुम पर,

शस्त्र मौन का धारण करना, विजय तुम्हारी होगी ।।

साम दाम और दंड भेद, चाहे षड़यन्त्र रचे हो,

तुम चलना राघव के पथ पर, विजय तुम्हारी होगी ।।

 

मन से हारे लोगों ने ही, जीती बाज़ी हारी है।

भूल गयें वो नियम वक्त का, आती सबकी बारी है।।

संकल्पित हो लक्ष्य साधने, वाले सब पा जातें है,

भगवतगीता के अध्यायों में, यह कृष्ण बताते है।।

हे! पार्थ उठो और कर्म करो, विजय तुम्हारी होगी

तुम चलना राघव के पथ पर, विजय तुम्हारी होगी ।।

 

एक तरफ संसाधन का सुख, एक तरफ गुणवत्ता।

एक तरफ वनवास चयन हो, एक तरफ हो सत्ता

धीर- वीर बलवीर वही जो, बनते गुण के साधक ।

कर्तव्यों का भान जिन्हें, वो ही सच्चे आराधक।।

सुनना ‘अन्तर्नाद’ हाँ निश्चित, विजय तुम्हारी होगी ।

तुम चलना राघव के पथ पर, विजय तुम्हारी होगी

 

जीवन के इस कुरुक्षेत्र में, जब रिश्ते दुर्योधन होंगे ।

अपनों से ही बैर निभेगें, अपमानित सम्बोधन होंगे ।।

खंडित होते देखेगें, जब-जब रिश्तों की मर्यादा को ।

भरी सभा में कर जोड़े, अन्तस् अर्जुन से रोएगें

सह लेना तुम पीर हृदय की, विजय तुम्हारी होगी ।

तुम चलना राघव के पथ पर, विजय तुम्हारी होगी।।

 

वर्षा श्रीवास्तव लखनऊ

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