Home कविता/शायरी बेज़ुबान बारिशें

बेज़ुबान बारिशें

ये बारिशें बेजुबान
हैं,,,आँखों की
पनीली सतह से
टप टप टपकती हैं
मर्म की बेइंतहा
नमी ओढ़ कर।

भीज कर देखा है
मैंने ,,,भी कई बार
पसीजतेे अरमान,
सीलते ख़्वाबों की
बू आती है इनमें से।

चाहत की नकारी हुई
ड्योढी़ पर,,
सिवाय फिसलन के
कुछ बचा भी तो नहीं,,
बदहवास साँसें हैं बस
यादो में तन्हा सी।

ये जब हूकती हैं तो
सीने में जज्ब तूफान
नासूर बन टीसते हैं..
हर रोज़ ,,,जलती हूँ मैं
दर्द की नामुराद भट्टी में

जहाँ ,,ख्वाहिशों
की खामोश सिसकियों
तले रूठ जाते हो तुम
मुझमें, हमेशा के लिए।

निधि भार्गव मानवी