हम क्या कर रहे हैं?

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आज लगभग जीवन के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चाहे हम राजनीति की बात करें , साहित्य -कला, खेल या क्यों न फिर किसी अन्य सरकारी/ नीजी प्रतिष्ठानों की , अक्सर देखा जा रहा है कि प्रत्याशियों का चयन जाति, धर्म, धन एवं बाहुबल के आधार पर किया जा रहा है । यदि बारीकी से देखा जाए तो किसी भी व्यक्ति द्वारा किए गए जन कल्याणकारी कार्यों , सामाजिक क्रियाकलापों, उसकी शराफत , योग्यता, बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता आदि चीजें मायने ही नहीं रख रही हैं। बहुदा यह देखा जा रहा है कि वर्तमान चयन समितियों और विभिन्न संस्थानों के द्वारा भी ऐसे व्यक्तियों के प्रति संतोषजनक रवैया या यूं कहें कि विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है , क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति और फलदार वृक्ष सदैव सर झुकाए मिलते हैं जिसे वर्तमान समय में मूर्खता का प्रतीक माना जाने लगा है।
बारीकी से देखें तो वर्तमान में जो व्यक्ति छल -कपट , जोर -जबरदस्ती , दहशत , बाहुबल या किसी अन्य प्रकार से लगता है कि वह अपना प्रभुत्व जमा लेगा तो यकीन मानिए उसी को महत्व दिया जा रहा है। मेरा मानना है कि यदि हम यही करते रहे तो आने वाले समय में इसके परिणाम घातक हो सकते हैं , और हमारा कल हमें माफ़ नहीं करेगा , क्योंकि आज किसी भी कार्य को करने कराने में उसके उद्देश्य, अर्थ यहां तक कि उसके प्रभावों की दिशा को भी आसानी से बदल दिया जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि वर्तमान /भविष्य सांप्रदायिक ताकतों, अपराधियों, भ्रष्टाचारियों व बाहुबलियों का होने वाला है । अर्थात हम आने वाले कल के लिए ऐसे तमाम अपराधियों, भ्रष्टाचारियों ,गैर जिम्मेदाराना व्यक्तियों को तैयार कर ही रहे हैं तो फिर क्यों अपने बच्चों को महंगे स्कूलों, कालेजों में पढ़ाकर अपनी सम्पत्ति बर्बाद कर रहे हैं ?
ठहरिए..! और सोचिए ..!
हो सकता है आपके पास हल हो …!
हमारा समाज, हमारी संस्कृति ,हमारी सभ्यता और समृद्धि के वास्तविक सूचक एकता , अखंडता और समता हैं। यदि हमारा समाज स्वस्थ होगा उसमें एकता,समता और भाईचारे की भावना होगी तो हमारा समाज स्वयं ही सुसभ्य और वासुधैव कुटुंबकम् से परिपूर्ण हो जायेगा ।
अतः सभी से अनुरोध है कि आप किसी सिंहासन के मोहताज नहीं हैं हमारे राष्ट्रीय प्रतीक बाघ से सीखिए क्योंकि वो चाचा जिस शिला पर बैठते हैं उसे ही सिंहासन बना देते हैैं, अतः सिंहासन की कठपुतली न बनकर सिंहासन निर्माता बनें ।
©सम्भावना पन्त

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