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मानव रत्न थे लंगट बाबू

राजसत्ता पोस्ट

कल्पना करिए 19वी सदी के उस दौर का, जब देश गुलाम था। पढ़ने-लिखने के बहुत सीमित अवसर हुआ करते थे। तब एक निरक्षर और एक पैर वाले एक दिव्यांग व्यक्ति ने उच्च शिक्षा के एक केंद्र की स्थापना उत्तर बिहार में करने का निश्चय किया। बहुत मुश्किल काम था। लेकिन देश के नौजवानों की परवाह करने वाले एक महामानव की जिद ने इस निश्चय को हकीक़त में बदल डाला। जी हाँ, हम बात बाबू लंगट सिंह की ही कर रहे है।

आरंभिक जीवन

साहस, संकल्प और संघर्ष की बहुआयामी जीवन जीने वालें बाबु लंगट सिंह का जन्म आश्विन मास, सन 1851 में धरहरा, वैशाली निवासी एक अत्यंत निर्धन परिवार में हुआ था। उनके पिताजी का नाम श्री अवध बिहारी सिंह था। निर्धनता का अभिशाप झेलते, जीवन जीने को संघर्ष करते परिवार में जन्म लेने की वजह से लंगट बाबु पढ़ाई नहीं कर पाए। कहा जाता है कि मनुष्य जीवन का विकास जटिल परिस्थितियों में होता है। संघर्ष की अग्नि से ही तपकर लोग यशस्वी बनते है। अपनी लगन, मेहनत और दूरदर्शी सोच से कीर्तिमान गढ़ते है। लंगट बाबु ने भी संघर्ष का रास्ता चुना। वे 24-25 वर्ष की उम्र में जीविका की तलाश में घर से निकल पड़े। लंगट सिंह महाविद्यालय के प्राचार्य रहे प्रख्यात शिक्षाविद व साहित्यकार डॉ.धर्मेन्द्र ब्रह्मचारी शास्त्री महाविद्यालय के स्वर्ण जयंती समारोह हेतु लिखे अपने लेख में लिखते है कि “जब लंगट बाबू जीविका की खोज में अपना गाँव छोड़कर चले थे तो उनके पास एक धोती और चार गोरखपुरिया पैसे मात्र थे। वे अकिंचन ही चले थे, पर कुछ ही वर्षों में अपनी कार्य-पटुता, इमानदारी और प्रतिभा की बदौलत वे लखपति बन गए।”

लंगड़ नाम इस तरह पड़ा

लंगट बाबू ने एक साधारण मजदूर के रूप में अपनी संघर्ष यात्रा शुरू की थी। घर से निकले तो काम मिली भी तो रेल पटरी के साथ साथ बिछाए जा रहे टेलीग्राम के खम्भों पर तार लगाने का। लेकिन अपनी कठोर मेहनत, व्यवहार कुशलता, कुशाग्र बुद्धि और स्थायी विश्वसनीयता के बल पर अत्यंत सम्मानित ठेकेदार और उदार जमींदार के रूप में स्थापित हो गये। इसी बीच दरभंगा में एक दुर्घटना हुयी। रेलवे से संबंधित एक काम का निरिक्षण करके लौट रहे लंगट बाबू की ट्राली मालगाड़ी से टकरा गयी, जिसकी वजह से उनका एक पैर एकदम चूर चूर हो गया। बाद में उस पैर को कटवाना पड़ा। मगर उन्होंने हार नही मानी। एक पांव से ही लाठी के सहारे फिर से सक्रीय हो गए। पैर कटने की वजह से ही वे लंगड़ से होते होते लंगट सिंह के नाम से विख्यात हो गए। तमाम झंझावातों को सहते रेलवे के मामूली मजदूर से जमादार बाबु, जिला परिषद्, रेलवे और कलकत्ता नगर निगम के प्रतिष्ठित ठेकेदार बनने की कहानी, आधुनिक फिल्मों की पटकथा से कम नहीं लगती।

सामाजिक जीवन

जीवन के कई वर्ष उन्होंने कलकत्ता में ठेकेदारी करते हुए बिताये। कलकत्ता के संभ्रांत समाज में उनकी कहीं ऊँची प्रतिष्ठा थी। बंगाली समुदाय से वे इतना घुल-मिल गये थे कि उन्हें लोग शुद्ध बंगाली ही माना करते थे। वे वहां के सभ्य समाज में न केवल सम्मानित थे बल्कि उस समय बंगाल के सामाजिक और राजनीतिक आन्दोलनों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे थे।

बंगाल में जब शैक्षणिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय जागरण के अग्रदूतों, स्वामी दयानंद, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, ईश्वरचंद विद्यासागर, सर आशुतोष मुखर्जी आदि के स्वर गूंज रहे थे, उस समय लंगट बाबू इन प्रसिद्ध युग-निर्माताओं के सतत संपर्क में थे। पंडित मदन मोहन मालवीय के साथ मैकडोनाल्ड बोर्डिंग हाउस के निर्माण में महीनों साथ रहे, वहां अपनी माताजी की स्मृति में एक कमरा भी बनवाया। बाद में BHU के निर्माण कार्य में में भी मालवीय जी के साथ बिहार और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में घूमकर चंदा इकठ्ठा करने में सहयोग किया।

स्वतंत्रता आन्दोलन के सहभागी

लंगट बाबू बहुआयामी कार्यों से बहुत प्रभावित भी थे और उनसे तन-मन-धन से जुड़े हुए भी थे। लंगट बाबू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से भी जुड़े हुए थे। सन 1959 में हुए स्वर्ण जयंती समारोह में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने अपने भाषण में उनसे 1906 में कलकत्ता में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में मिलने की बात कही थी, जहाँ लंगट बाबू ने स्वदेशी प्रदर्शनी हेतु अत्यंत कम समय में भव्य पांडाल बनवाया था। वे 1910 में कांग्रेस की इलाहबाद में हुए अधिवेशन में मुजफ्फरपुर से प्रतिनिधि के रूप में 7 दिसंबर को हुए बैठक में निर्वाचित हुए थे।
स्वदेशी के बड़े पैरोकार थे लंगट बाबू
लंगट बाबू बंगाल से शुरू हुयी स्वदेशी आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे थे। जब स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ तो न केवल उससे जुड़े बल्कि आंदोलन के सक्रीय सहभागी भी बने। आंदोलन के लिए धन इकठ्ठा करने के क्रम में उन्होंने दरभंगा महाराज को पचास हज़ार रूपया दान में देने को प्रेरित किया। कलकत्ता में खुले “स्वदेशी स्टोर्स, बंग-कॉटन मिल्स” के वे निदेशकों में से एक थे।उन्होंने मुजफ्फरपुर में “तिरहुत स्टोर्स” भी खोला। वे बंगाल और बिहार से दूर उत्तर प्रदेश और पंजाब तक स्वदेशी आन्दोलन के प्रचार में गए।
वे स्वदेशी आंदोलनों के मंच पर प्रभावशाली व आत्मविश्वास से भरी भाषण भी देते थे। एक निरक्षर, कभी मजदुर रहे एक व्यक्ति को धाराप्रवाह भाषण देते देख सुनकर लोग आश्चर्य व्यक्त करते थे। एक बार वर्धमान में बंग राजनीतिक परिषद् में जब उन्हें वक्ता के तौर पर बुलाया गया था तो उन्होंने इतना बढ़िया भाषण दिया था कि सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी द्वारा संपादित प्रसिद्ध पत्रिका “बंगाली” में अक्षरसः लंगट बाबू का भाषण प्रकाशित हुआ था

मिला था बिहार रत्न की उपाधि

प्रयाग कुंभ में भारत धर्म महामंडल द्वारा लंगट बाबू को बिहार रत्न की उपाधि दी गयी थी। सरकार ने भारत धर्म महामंडल और उसकी प्रतिद्वंदी धार्मिक संस्था सनातन धर्म महासभा के बीच मैत्री संबंध विकसित करने के प्रयासों के फलस्वरूप महारानी विक्टोरिया के शासन काल की रजत जयंती के अवसर पर बाबू साहब को प्रतिष्ठा का प्रमाणपत्र भी दिया गया था।

L.S.College की स्थापना का विचार

बाबु लंगट सिंह की जीवन-दृष्टि बहुत ही उदार, उदात्त और व्यापक थी। खास कर बंगाल और बिहार में अपनी जीवन-यात्रा के पथ पर वे अनेक प्रभावशाली लोगों से जुड़े हुए थे। इसी क्रम में शिक्षा का एक केंद्र बनाने का विचार उन्हें आया। उन्होंने जातीय संगठनों को एक मंच पर लाकर इस हेतु प्रयास शुरू कर दिया। काशी नरेश, तमकुही नरेश, महाराजाधिराज दरभंगा, मांझा स्टेट के लाल बाबू, हथुआ के राजा साहब, उत्तर प्रदेश और बिहार के अनेक जागृत प्रगतिशील लोगों को एकजुट करके उन्होंने जातीय उत्थान, शैक्षणिक विकास, बाल-विवाह, तिलक दहेज़ आदि के विरोध से संबंधित कार्यों को गति देने लगे।यही प्रयास धीरे धीरे ठोस रूप धारण किया और अंततः 1899 में मुजफ्फरपुर में भूमिहार ब्राह्मण सभा के एक नियमित अधिवेशन में इस कॉलेज को खोलने का निर्णय ले लिया गया।लंगट बाबू ने जीवन पर्यंत महाविद्यालय के विकास हेतु चिंतित रहे। एक संरक्षक की भूमिका निभाते हुए उस समय ढाई से तीन लाख रुपए देकर इसे मजबूती प्रदान किया। वे चाहते तो अकेले इस काम को कर सकते थे लेकिन सबकों साथ लेकर इस शैक्षणिक संस्थान को समाज के अधिकतम सहभागिता से बनने वाले संस्थान के रूप में देखा।

पं. मदन मोहन मालवीय जी, महाराजाधिराज दरभंगा, काशी नरेश प्रभुनारायण सिंह, परमेश्वर नारायण महंत, द्वारकानाथ महंत, यदुनंदन शाही, धर्मभूषण रघुनन्दन चौधरी और जुगेश्वर प्रसाद सिंह जैसे विभिन्न वर्गों के विद्याप्रेमी सज्जनों के साथ जुड़कर शिक्षा का अखंड दीप उन्होंने मुजफ्फरपुर में जलाया था, जो आज लंगट सिंह महाविद्यालय के वट वृक्ष के रूप में मौजूद है। जब बात काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बनने की आयी तो उन्होंने तब इस कॉलेज के निर्माण कार्य हेतु रखे पैसे दान कर दिए। यही थी उनकी अनोखी, सबों को समेट कर किसी शुभ कार्य को संपन्न करने की विलक्षण जीवन-साधना, दृष्टि और शैली। अद्भुत मेधा के युग-निर्माता, एक कृति पुरुष थे बाबु साहब, जिसका उदाहरण मिलना कठिन है अब।

आज जब व्यक्ति व्यक्तिगत स्वार्थ की सीमा से परे कुछ सोचना ही नही चाहता, हर कदम हित-अहित की सोचकर रखता है, वैसे समय में जब हम बाबु लंगट सिंह के बारे में सोचते है तो लगता है जैसे मनुष्यता अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। दूसरों के विकास की चिंता अपने धन खर्च करके कहाँ कर पाते है लोग। जितना बड़ा परिसर उन्होंने महाविद्यालय के लिए लोगों से दान करवा के जुटा लिया, वह उनकी प्रतिभा का विलक्षण उदाहरण है।

शिक्षा के प्रति उनके योगदानों व दूरदर्शी सोच को जब हम वर्तमान समय की आवश्यकता से तुलना करते है तो पाते है कि सचमुच में वे सिर्फ बिहार रत्न ही नही, मानव रत्न थे। लंगट बाबु ने धन अर्जित किया तो श्रम से, अच्छे साधनों से। धन खर्च किया ऊँचे उदेश्यों की पूर्ति के लिए। श्रेष्ठतम जीवन-मूल्यों की रक्षा के लिए। आज से सौ वर्ष पहले काशी और कलकत्ता के मध्य गंगा के उत्तरी तट पर तब कोई कॉलेज नहीं था। हाई स्कूलों की संख्या नगण्य थी। तब उस शिक्षा के घोर अन्धकारच्छन्न युग में, ऊँची शिक्षा के लिए मुजफ्फरपुर में महाविद्यालय की स्थापना को पुरे दृढ विश्वास के साथ चरितार्थ किया। कितने बड़े साहस का काम था कॉलेज खोलने का! यदि यह नहीं हो पता तो लाखों छात्र स्नातक और स्नातोकोत्तर परीक्षाओं में उतीर्ण हो राष्ट्र की बहुमुखी जीवन-धारा में ऐसी गति दे पाते क्या? कतई संभव नहीं था। ऊँची शिक्षा के प्रसार, सांस्कृतिक उत्थान और सामाजिक परिवर्तन के लिए बिहार में उनकी जो महत्वपूर्ण भूमिका रही है, वह इतिहास के पृष्ठों में स्वर्णाक्षरों में लिखी जाएगी।

आज उनको दिवंगत हुए 102 वर्ष हो गये, तब भी उनका परोपकार-प्रियता, समग्र समाज की सेवा भावना, शिक्षा-प्रेम, सांस्कृतिक जागरण के प्रति उनकी कठोर प्रतिबद्धतता -उनके जीवन की ये खूबियाँ हमें उस महापुरुष की याद दिलाती है, शुभ कर्मों के लिए प्रेरणा देती है। लंगट बाबु के जीवन की ऊँची नीची घाटियों की यात्रा, कितनी जटिल, श्रमसाध्य और विपत्तियों से बेतरह भरी हुई थी, उसका सम्पूर्ण लेखा-जोखा 15 अप्रैल, 1912 को उनके निधन के साथ ही शून्य में विलीन हो गयी। परन्तु उस साहसिक जीवन-यात्रा, सच्चे उदेश्य के लिए सतत निष्ठापूर्वक श्रम, समाज के लिए उदहारण है। जब भी मुजफ्फरपुर और तिरहुत के इतिहास के पन्ने लिखे जायेंगे वह बिना लंगट बाबु के कभी पूरा नहीं होंगी।

आशा ही नहीं , पूरा विश्वास है, वर्तमान पीढ़ी उस विराट व्यक्तित्व से प्रेरणा ग्रहण करेगी, बाबू लंगट सिंह के स्वप्नों को साकार करते हुए राष्ट्र की उन्नति में अपने योगदान सुनिश्चित करेगी।

सतीश राय भूमिहार की फेसबुक वॉल से साभार