Home स्पेशल नदी की गति में आती हैं रुकावटें (नदी दिवस पर विशेष)

नदी की गति में आती हैं रुकावटें (नदी दिवस पर विशेष)

नदी दिवस पर विशेष

नदी की गति में आती हैं रुकावटें

शिव की शिखा से बंधी नदी धीरे-धीरे खुलती है।धरा पर अठखेलियां करती हुई; पत्थरों के मध्य से अपना रास्ता बनाते हुए उन्मुक्त चली जाती है। उतरती है नैनों में ओस की बूंद बन व अधरों को सुमन समान खिला जाती है।
रोको ना उसे बहने दो। बहने के लिए बहती है। वह अपने संग अनेक कटाव लिए जाती है। सिमटी सी नदी कली से गुलाब की तरह धीरे धीरे खुलती जाती है। जैसे-जैसे आगे बढ़ती है वैसे-वैसे और भी चौड़ी होती जाती है। बाहों का दामन बढ़ता जाता है मानो आकाश समेटे जाती है।


उसके भीतर अनेक रास्तों के सफ़र के निशान यादें बन समाते जाते हैं। अनेक अनचाहे चीजों को वह किनारे छोड़ती जाती है। अपने उफान पर हो तब किनारों को विध्वंश कर अपने साथ बहा ले जाती है।
आती हैं अनेक रुकावटें मगर वह रुकती नहीं है। इठलाती, बलखाती, आत्मविश्वास से भरपूर अनुभव के साथ पत्थरों, चट्टानों को पार करते हुए अपने अस्तित्व को अस्तित्वविहीन करने के लिए खारे सागर में मिल जाती है। सागर से मिलना ही मुक्ति का मार्ग है। जिसके बाद वह सूक्ष्म शरीर में लिए बादल बन उड़ जाती है।…

✍🏻संगीता कुमारी (लेखिका/कवयित्री)
नरोरा बुलंदशहर