Home स्पेशल खजुराहो ……. काम से राम तक

खजुराहो ……. काम से राम तक

तेरा हर नक्श है पत्थर पै जवानी का उभार
तुझमें महफूज है अय्यामें गुजिशता की बहार

ताजमहल के बाद, भारत में सबसे ज़्यादा देखे और घूमे जाने वाले पर्यटन स्थलों में अगर कोई दूसरा नाम आता है तो वह है, खजुराहो। खजुराहो, भारतीय आर्य स्थापत्य और वास्तुकला की एक नायाब मिसाल है। खजुराहो को इसके अलंकृत मंदिरों की वजह से जाना जाता है जो कि देश के सर्वोत्कृष्ठ मध्यकालीन स्मारक हैं। मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित खजुराहो का इतिहास काफी पुराना है। खजुराहो का नाम खजुराहो इसलिए पड़ा क्योंकि यहां खजूर के पेड़ों का विशाल बगीचा था। खजिरवाहिला से नाम पड़ा खजुराहो। इब्नबतूता ने इस स्थान को कजारा कहा है, तो चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी भाषा में इसे ‘चि: चि: तौ’ लिखा है। अलबरूनी ने इसे ‘जेजाहुति’ बताया है, जबकि संस्कृत में यह ‘जेजाक भुक्ति’ बोला जाता रहा है। चंद बरदाई की कविताओं में इसे ‘खजूरपुर’ कहा गया तथा एक समय इसे ‘खजूरवाहक’ नाम से भी जाना गया। लोगों का मानना था कि इस समय नगर द्वार पर लगे दो खजूर वृक्षों के कारण यह नाम पड़ा होगा, जो कालांतर में खजुराहो कहलाने लगा। ये मंदिर अपनी नागरा आकृति और कामोत्तेजक मूर्ति कला के लिए प्रसिद्ध है।


खजुराहो का पार्श्नाथ जैन मन्दिर 10वीं शती ई0 में चन्देल समाज एवं शासकों के धार्मिक उदारता एवं पारस्परिक सामंजस्य का उदाहरण है जिस पर ब्राह्मण देवी-देवता भी हैं, जैन तीर्थथर भी हैं और बाहुबली भी हैं। सुन्दरतम अप्सराओं या नायिकाओं के शिल्पांकन के माध्यम से धार्मिक, आध्यात्मिक जगत के साथ ही भौतिक जगत के सौन्दर्य तथा अनुराग के भाव को व्यक्त किया गया है। इन सबसे हटकर देव, मानव, पशु और वनस्पति जगत की साथ-साथ अभिव्यक्ति भारतीय कला तथा खजुराहो की कला का एक वेशिष्टत्र रहा है।
खजुराहो में वे सभी मैथुनी मूर्तियां अंकित की गई हैं, जो प्राचीनकाल का मानव उन्मुक्त होकर करता था जिसे न ईश्वर का और न धर्मों की नैतिकता का डर था। अधिकतर धर्मों ने काम का विरोध कर इसका तिरस्कार ही किया है जिसके चलते इसे अनैतिक और धर्मविरुद्ध कृत्य माना जाता है। धर्म, राज्य और समाज ने स्त्री और पुरुष के बीच के संपर्क को हर तरह से नियंत्रित और सीमित करने के अधिकतर प्रयास किए।


काम न तो रहस्यपूर्ण है और न ही पशुवृत्ति। काम न तो पाप से जुड़ा है और न ही पुण्य से। यह एक सामान्य कृत्य है लेकिन इस पर प्रतिबंध के कारण यह समाज के केंद्र में आ गया है। पशुओं में काम प्रवृत्ति सहज और सामान्य होती है जबकि मानव ने इसे सिर पर चढ़ा रखा है। मांस, मदिरा और मैथुन में कोई दोष नहीं है, दोष है आदमी की प्रवृत्ति और अतृप्ति में। कामसुख एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है, लेकिन मनुष्य ने उसे अस्वाभाविक बना दिया है।
खजुराहो के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कामकला के आसनों में दर्शाए गए स्त्री-पुरुषों के चेहरे पर एक अलौकिक और दैवी आनंद की आभा झलकती है। इसमें जरा भी अश्लीलता या भोंडेपन का लेशमात्र भी आभास नहीं होता। ये मंदिर और इनका मूर्तिशिल्प भारतीय स्थापत्य और कला की अमूल्य धरोहर हैं। इन मंदिरों की इस भव्यता, सुंदरता और प्राचीनता को देखते हुए ही इन्हें 1986 विश्व धरोहर में शामिल किया गया है।
‘कामसूत्र’ की तरह ही खजुराहो के मंदिर भी विश्वप्रसिद्ध हैं क्योंकि इनकी बाहरी दीवारों में लगे अनेक मनोरम और मोहक मूर्तिशिल्प कामक्रिया के विभिन्न आसनों को दर्शाते हैं। कुछ तो ऐसे मूर्तिशिल्प भी हैं जिन्हें देखकर आधुनिक चेतना से लैस व्यक्ति भी भौंचक्का रह जाता है। ये मूर्तिशिल्प लक्ष्मण, शिव और पार्वती को समर्पित मंदिरों का अंग हैं, इसलिए इनके धार्मिक महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता।
कथक उस्ताद पंडित बिरजू महाराज ने एक बार कहा था कि- “खजुराहो एक ऐसी जगह है जहां मंदिर और मन की साधना के मंदिर का मिलन होता है।”
खजुराहो के मंदिर आधुनिक और पुरातन काल के बीच में एक कड़ी है। आर्य शिखर शैली के ये मंदिर गत दस शताब्दियों द्वारा अपने ह्रदय में सजाकर रखे परिषकृत एवं विषद्ता के प्रमाण हैं। हजार वर्षों के प्राकृतिक प्रकोपों, धूप और आंधियों के बावजूद, ये मंदिर आज भी एक सुंदर मोती ही तरह भारत की कंठमाला में अपने प्राकृतिक स्वरुप में चमक रहे हैं। खजुराहो के ये मंदिर लगभग 100 साल की अवधि में बनाए गए हैं।
खजुराहो शिल्पकला के उन प्रसिद्ध स्थानों में से हैं, जो विश्व में अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं। शिल्प तथा कला का अद्वितीय दर्शन इन मंदिरों में देखने को मिलता है। मंदिर का शिल्पकला एक अद्भुत खजाना है, जिसका मूल्य अपूर्णीय है। कहीं भी प्रस्तरों को धन नहीं माना जाता, परंतु खजुराहो के मूर्तिमान पत्थरों को यदि सोने के साथ तोल दिया जाए, तब भी उनका मूल्य चुकाना असंभव है। इन मंदिरों की भव्यता से एक तरह की शांति एवं संसार में कुछ पा लेने का संतोष झलकता है। कला के इस सम्राज्य में भारतीय और आर्यकला की भव्यता का मिश्रण, एक पूर्णता को जन्म देता है। इन मंदिरों के निर्माण में कोई भी कमी नहीं रही है, बल्कि ये मंदिर अपने आप में पूर्ण है।
ग्रेनाइट और बलुआ पत्थरों से बने ये मंदिर हजार वर्षों से अपने मटियाले गुलाबी तथा हल्के पीले रंग में उन सभी को मूक आमंत्रण देते हैं- जिन्होंने कभी किसी तत्व से प्रेम किया है, जो, प्रेम की तलाश में भटकते रहे हैं, जिनके, स्वरों की प्रतिध्वनियाँ चट्टानों से टकराकर लौट आई है, खाली- स्वरहीन होकर इन मंदिरों के सौंदर्य से किसी की आँखों में प्यार लौट आता है, तो किसी के मूक स्वरों में वाणी।


सांस्कृतिक धरोहर के रुप में विद्यमान खजुराहो के मंदिर अपनी विशेषताओं के कारण न केवल भारत वर्ष, बल्कि संसार में विख्यात है। खजुराहो की शिल्प का विकास मूर्तियों के स्वरुप में किया गया है। मंदिरों की दीवारों के अंदर और बाहर, मूर्तियाँ इस तरह बनायी गई है कि ये आँखों का पेय बन गई है। कुछ मंदिरों में मूर्तिकारों ने मूर्तियों में भव्यता और विशालता भर दी है।
पार्थनाथ मन्दिर पर कुछ अतिविशिष्ट मूर्तियाँ हैं जैसे राम-सीता के साथ हनुमान की मूर्ति। पार्शनाथ मन्दिर के राम-सीता एवं हनुमान की मूर्ति में चतुर्भुज राम पारम्परिक रूप में बाण एवं धनुष सहित सीता के साथ खड़े हैं किन्तु उनका आलिंगन मुद्रा में निरूपण सामान्यतः परम्परा से हटकर विलक्षण और खजुराहो शिल्पी के उस मन-बुद्धि की देन है जहाँ राम मर्यादा पुरुषोत्तम से हटकर शिव के समान देव कोटि में आ जाते हैं। इस मूर्ति की विशिष्टता राम का हनुमान के मस्तक पर रखा हुआ हाथ है जिससे हनुमान के प्रति राम का स्नेहपूर्ण वात्सल्य-भाव मुखर हो उठा है।
यहाँ राम की तुलना में हनुमान की छोटी आकृति भक्तिभाव की उस श्रेष्ठा का संकेत देती है जहाँ विनय एवं लघुता में ही भक्त की पूर्णता है। इस मूर्ति की दूसरी विशिष्टता ठीक ऊपर साथधुवेश में रावण का सीता से भिक्षा मांगते हुए अंकन है। यदि दोनों मूर्तियों को एक साथ जोड़कर देखें तो उनका सांकेतिक महत्व रामकथा के संदर्भ में समझा जा सकता है।
विश्वनाथ मंदिर में 674 मूर्तियाँ हैं, जबकि कदंरिया महादेव में 872 मूर्तियाँ है। वराह मंदिर में बराहदेव की मूर्ति पर हिंदू देवी-देवताओं की 672 मूर्तियाँ अंकित की गई है। कुछ मंदिर ऐसा है, जिसकी दीवारों पर कोई भी स्थान ऐसा नहीं है, जहाँ मूर्तियाँ न अंकित की गई है। यहाँ देवी-देवताओं, नाग-नागिनियों, नायिकाओं, अप्सराओं, पशुओं तथा मिथुन युग्मों का अनेक मुद्राओं में अंकन किया गया है। एक लय, एक गति, एक शोभा से भरी हुई, यह प्रतिमाएँ मन को मोह लेने वाली है। कहीं-कहीं देवी-देवताओं की मूर्तियों 9′, लंबी और 14′ ऊँची बनायी गई हैं। प्रत्येक मूर्ति का अपना सौंदर्य है। देवता, देवियाँ, अप्सराएँ, पुरुष और नारियाँ सौंदर्य के संसार में गतिमान हैं। प्रतिमाओं के शरीर की शिथिलता या यौवन के उभार पत्थरों से छलकते हुए बाहर आते दिखाई देते हैं। धर्म, संस्कृति, समाज, अर्थ और राजनीति से जुड़ी, यह प्रतिमाएँ अपने निर्माता की कहानी कहती दिखाई देती है। नारी के आभूषण हमारे कल का आभास करते हैं। बालों के गुंथने या उनके पहरावे में कहीं मानिनी नायिका, कहीं मुग्धा, तो कहीं परकीया के मनभावन क्रिया-कलापों के दर्शन कराते हैं, तो कहीं स्नानागार से निकलकर श्रृंगार करती हुई तरुणी का आभास कराते हैं।
यहां मंदिरों पर मूर्तिकला के जरिए इंसानी जीवन और उसकी संवेदनाओं को बारीकी से उकेरा गया है। यहां की ऐसी कलात्मक अभिव्यक्ति न केवल शिल्पियों की, बल्कि यहां के चंदेल राजाओं की असाधारण दृष्टि को भी दर्शाती है। नारी शरीर की कोमलता और सौष्ठव का हर पहलू उभारने के ऐसे सुंदर प्रयास मंत्रमुग्ध करते हैं। यहां नारी-जीवन के अनेक प्रसंग मौजूद हैं। जैसे, कहीं वह अपनी वेणी गूंथ रही है, कहीं दर्पण में अपने सौंदर्य को निहार रही है, तो कहीं आलता लगा रही है। करीब एक हजार साल पहले कलाकारों में ऐसी कल्पनाशीलता आज भी हर किसी को हैरान करती है।
सदियों से यह कौतुहल का विषय रहा है कि आखिर क्यूँ इस तरह के मंदिरों का निर्माण किया गया होगा। इस विषय में विश्लेषकों में सदैव से मत-भिन्नता रही है।
कुछ विश्लेषकों का यह मानना है कि प्राचीन काल में राजा-महाराजा भोग-विलासिता में अधिक लिप्त रहते थे। इसी कारण खजुराहो मंदिर के बाहर नग्न एवं संभोग की मुद्रा में विभिन्न मूर्तियां बनाई गई हैं, किसी के अनुसार मंदिर-निर्माण सेक्स की शिक्षा की दृष्टि से किया गया होगा। वहीँ कुछ विश्लेषकों का यह मानना है कि मोक्ष के लिए हर इंसान को चार रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है- धर्म, अर्थ, योग और काम। इसी दृष्टि से मंदिर के बाहर नग्न मूर्तियां लगाई गई हैं।
कुछ विश्लेषकों के अनुसार इसके पीछे हिंदू धर्म की रक्षा की बात बताई गई है। इन लोगों के अनुसार चंदेल शासकों के समय बौद्ध धर्म का प्रसार काफी तेजी के साथ हो रहा था। हिंदू बौद्ध धर्म की तरफ आकर्षित हो रहे थे तब तत्कालीन चंदेल शासकों ने हिंदू धर्म के अस्तित्व को बचाने लिए उन्होंने इसी मार्ग का सहारा लिया। यदि मंदिर के बाहर नग्न एवं संभोग की मुद्रा में मूर्तियां लगाई जाएंगी, तो लोग इसे देखने मंदिर आएंगे और भगवान का दर्शन करने जाएंगे। इससे हिंदू धर्म को बढ़ावा मिलेगा। उस समय भी यह मान्यता थी कि सेक्स की तरफ हर कोई खिंचा चला आता है।
चंदेलों के शासन के बाद यानी 14वीं शताब्दी के बाद खजुराहो के मंदिर अतीत की परतों में गुम होते गए। फिर बीसवीं सदी के आरंभ में एक अंग्रेज इंजीनियर टी.एस. बर्ट ने नए सिरे से इन मंदिरों को दोबारा दुनिया के सामने रखा। ये मंदिर पश्चिमी, पूर्वी और दक्षिणी मंदिर समूह के रूप में विभाजित हैं। अधिकतर महत्वपूर्ण मंदिर पश्चिमी समूह में स्थित हैं। इनका निर्माण रथ शैली में हुआ है। चित्रगुप्त मंदिर, जगदंबी मंदिर और चतुर्भुज मंदिर रथ शैली में बने हुए छोटे मंदिर हैं। लक्ष्मण मंदिर, विश्वनाथ मंदिर और दूल्हादेव मंदिर पंचरथ शैली में बने हैं। मशहूर कंदारिया महादेव मंदिर सप्तरथ शैली का शानदार नमूना है। भले ही हम-आप कला-पारखी न हों, लेकिन यहां का स्थापत्य कला हैरान कर देता है। प्रत्येक मंदिर ऊंचे चिकने ग्रेनाईट के चबूतरे पर निर्मित है। इनकी बनावट ऊघ्र्वगामी है यानी इनका प्रक्षेपण नीचे से ऊपर की ओर है।
प्रसिद्ध दार्शनिक आचार्य रजनीश(ओशो) ने खजुराहो की प्रस्तरों पर बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही थी कि खजुराहो की मूर्तियों के चेहरे को देखकर ऐसा लगता है, जैसे बुद्ध का चेहरा हो, महावीर का चेहरा हो, मैथुन की प्रतिमाओं और मैथुन रत जोड़े के चेहरे पर जो भाव है, वे समाधि के है, और सारी प्रतिमाओं को देख लें और पीछे एक हल्की-सी शांति की झलक छूट जाएगी और कुछ भी नहीं। और एक आश्चर्य आपको अनुभव होगा।
खजुराहो मानव संग्राहालय है या इसे स्त्री-पुरुष प्रधान एक संस्था कहा जा सकता है। कलाकारों ने प्रकृति की छटा में सौंदर्य के साथ-साथ, उस समय के मनोरंजन और क्रीड़ाओं की ओर ध्यान दिया है। यहाँ की कलाकृतियाँ प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक आयु के व्यक्ति से संबंध जोड़ती दिखाई देती है।
कालिदास ने जिस तरह अपने समय की वर्जनाओं को नकार कर ‘कुमारसंभव’ में पार्वती का जैसा चित्रण किया है, जयदेव और विद्यापति ने जैसे मुक्तभाव से राधा-कृष्ण के प्रेम का भक्तिपूर्ण- श्रृंगारिक वर्णन किया है और हिन्दी के रीतिकालीन कवियों ने जिस प्रकार के नायक-नायिका भेद पर आधारित काव्य की रचना की है, वह अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि हमारे देश की परंपरा काम और प्रेम के प्रति स्वस्थ और खुली दृष्टि अपनाती थी। खजुराहो के मंदिर में विगत 47 वर्षों से प्रतिवर्ष उसके प्रांगन में होने वाला अन्तराष्ट्रीय स्तर का नृत्य महोत्सव का आयोजन इसी दृष्टि की उल्लासपूर्ण अभिव्यक्ति है।

✍🏻 नीरज कृष्ण