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नशे की खोखली दौड़ की होड़ में युवा

 

खोखली दौड़ की होड़

चार मित्र नशा कर रहे थे। उनका पाँचवा मित्र आता है और उस नशे की मंडली में शामिल हुए बगैर उस समुह में रहना चाहता है। अन्य चारों दोस्त उसके समक्ष शर्त रखते हैं कि उनके बीच रहना है तो उनके जैसा नशा करना होगा! वह अपने संस्कारों के कारण उनसे उस नशे का सेवन करने से इंकार कर देता है। मगर वो चारों मित्र उस पर बार बार मित्रता का हवाला देकर दबाब डालते हैं कि अगर उनके बीच रहना है तो उनके साथ नशा करना ही होगा। वह उठकर वहाँ से चला जाता है। क्योंकि उसे बचपन से यह सिखाया गया है कि जुवाँ खेलना, नशा करना बहुत गलत बात है। इसका सेवन अच्छे से अच्छे व्यक्ति को भी बर्वाद कर देती है। उस सभ्य मित्र के जाते ही वो चारों मित्र उसे फट्टू कहकर उसका मजाक बनाने लगते हैं। कोई उसे लल्लू तो कोई पिछड़ा गँवार तो एक उसे गाली देते हुए माँ का चिपकू कहकर सम्बोधन करने लगते हैं। वो चारों अपने माँ पिता का विश्वास बड़े ही शान से तोड़ते हुए उस बालक को अपमानित करते हैं; जो अपने माता पिता का आज्ञाकारी, विश्वासी पुत्र है।

अधिकांश कॉलेजों के अधिकतम छात्रों को इस बात का अहसास ही नहीं होता है कि वो कब नशे की खोखली दुनिया में प्रवेश कर जाते हैं। शिक्षा के लिये दिये गये अपने अभिवावक के धन को नशे में गँवाते हैं। एक वह बालक जो अभिवावक के द्द्वारा दिये गये धन से दूध, लस्सी, छाछ पीता है व फल खाकर अपनी पढ़ाई पर ध्यान देता है। वह अपने ही चार मित्रों के मध्य मजाक का पात्र भी बनता है। उस सभ्य बालक को नित चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। क्योंकि उसे इस बात का अहसास होता है कि मेरे अभिवावक की मेहनत ईमादारी की कमाई से मेरी पढ़ाई में बारह/ पंद्रह /बीस लाख रुपये खर्च हो रहे हैं। जीवन का बहुमूल्य समय नशा सेवन करके बर्बाद नहीं करना चाहिये।

छोटे बड़े शहरों के स्कूल कॉलेजों के छात्रों का अगर ब्लड सैम्पल ले लिया जाये तो यह खुलासा भी आसानी से हो जायेगा कि किस स्कूल कॉलेज के कितने मासूम बच्चे इस नशे में लिप्त हैं। माँ पिता बच्चों को किताब कॉपी खाने के लिये जो राशि देते हैं वो धन कहाँ कितना जा रहा है। हमारे समाज की जड़े कहाँ कितनी खोखली हो रही हैं और कौन खोखला कर रहा है; इसका भी पता चल जायेगा। एक एक मुफ्त की बोतल और चुटकी भर देकर भीड़ इकठ्ठी करने वालों का भी मुखौटा उतरना चाहिये!

हमारा देश युवाओं का देश है। विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। इस कारण हमारे देश की जिम्मेदारियाँ भी उतनी अधिक बढ़ जाती हैं कि हम मजबूत बनें, सशक्त बनें, अपनी ऊर्जा का उपयोग अपने देश के विकास में प्रयोग करें। अगर प्रति हजार में एक बालक भी कुछ नया रचनात्मक/अविष्कारक कार्य करता है तब भी वह अन्य नौ सौ निन्यानवें बालकों को अपने साथ आगे बढ़ाने में सफल हो सकता है।

छिपी प्रतिभा को उभारने का कार्य बालक के माता पिता और गुरू उसकी दस वर्ष की आयू तक सरलता से कर सकते हैं। बचपन में बालक पौध में डाले गये खाध पानी के संस्कारों का फल धीरे धीरे उसके युवा होते होते दिखने लगता है। यह बात सही है कि कोई भी माता पिता अपने बालक में कुत्षित विचारों का पोषण पसंद नहीं करते हैं। मगर सभी अभिवावक को यह भी सोचना चाहिये कि बालक बहुत कुछ अपने अभिवावकों को देखकर भी सीखते हैं। माली बनकर अपने बच्चों की देखभाल बहुत ही ध्यान से करना पड़ता है। अगर केवल प्रकृति के भरोसे छोड़ देंगे तो वह भी मौसम के अनुकूल बन जायेगा। परिणाम कुछ भी हो सकता है!

स्कूल कॉलेजों के बच्चों को बहुत ही आसानी से टारगेट किया जाता है। एक से दो, दो से चार, चार छह की संख्या बढ़ती जाती है जिससे नशेढ़ी गिरोह के साथ नशे का करोबार करने वाला नीच व्यक्ति दिन दौगुनी रात चौगुनी के हिसाब से तरक्की करता जाता है। देखने वाले आँखे फाड़कर देखते ही रह जाते हैं और आपस में बतियाते हैं कि ये कैसे इतने अमीर बन गये! अगर जानकारी हो भी जाये भी चुप्पी लगा देते हैं क्योंकि इस धंधे का आदमी आदमी ना रहकर दानव बन जाता है जिसमें संवेदना शून्य मात्र होती है।

आज भी समय है अगर हम अपनी भावी पीढ़ी को इस नशे से बचा सकें तो देश अवश्य उज्जवल भविष्य की ओर बढ़ेगा। क्योंकि देश का आधार ही हमारी युवा है। अगर युवा सचेत हो गयी तो नयी निकली हुईं कपोलों को वो सम्भाल सकेंगे। भारत की जड़ें भ्रष्टाचारियों के कारण ही नहीं अपितु नशेढ़ियों के कारोबार के कारण भी खोखली हुई हैं। आशा है हमारी सरकार और जनता इस ओर अवश्य जागरूक होगी।…

संगीता कुमारी
(लेखक/ कवयित्री)
नरोरा बुलंदशहर