Home स्पेशल स्वतंत्रता के असली मायने

स्वतंत्रता के असली मायने

 

 

राजसत्ता पोस्ट

आज हम अपना 74 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। आज के दिन हम हर उस स्वतंत्रता सेनानी को नमन करते हैं, जिसने अपने ऐश-ओ-आराम को छोड़कर, लोगों के दिल और दिमाग में स्वतंत्रता की चिंगारी जगाने से लेकर आजादी के लिए अपने खून का बलिदान देने में भी ज़रा सा संकोच नहीं किया।

आज, आजादी के 73 साल बाद, लोगों के लिए स्वतंत्रता दिवस और स्वतंत्रता, दोनों के ही मायने बदल गए हैं। कुछ लोगों के लिए स्वतंत्रता दिवस का मतलब स्कूल में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों से है तो कुछ लोगों के लिए ध्वजारोहण करना एक जिम्मेदारी की तरह है और झंडा फहराते ही उनका स्वतंत्रता दिवस भी खत्म हो जाता है, और वहीं कुछ लोगों के लिए ये महज़ एक छुट्टी का ही दिन बन के रह गया है ।


स्वतंत्रता के मायने भी बदल गए हैं लोगों के लिए , जैसे कुछ लोगों को लगता है कि उन्हें कुछ भी कहने और करने की आजादी है चाहे ऐसा करने से वो अपने ही देशवासियों के अधिकारों का हनन क्यों न कर रहे हों।

स्वतंत्रता क्या है ?

मेरा मानना है,”किसी देश में रहने वाले व्यक्तियों की स्वतंत्रता सिर्फ उतनी ही है, जितना कि उस देश का संविधान उन्हें मुहैया कराता है।”
हमें अपने पूर्वजों ,महापुरुषो , सेनानियों का आभारी होना चाहिए कि उन्होंने हमें ऐसे उदार संविधान से गौरवान्वित कराया जो 1950 के दशक में समानता की बात कर रहा था। एक ऐसा समय जब अमेरिका में अश्वेत लोगों के पास वोट करने का अधिकार नहीं था, हमारे देश के हर नागरिक को बिना लिंग या जाति के भेदभाव के वोट करने का अधिकार मिला था।


अगर हमें अपनी आजादी के सही मायने जानने हैं तो इसे हमे अपने संविधान में ढूंढ़ना चाहिए। संविधान में दिए हुए मौलिक अधिकार, मौलिक कर्तव्यों से समझना चाहिए।
हमें इतना तो आसानी से समझ आ जाएगा कि आजादी सिर्फ एक दिन मनाने का कोई पर्व नहीं है, इसे हर दिन, हर पल मनाना चाहिए।

स्वतंत्रता को कैसे संभाले ?

आजादी कभी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में खून के माध्यम से नहीं जाती है, इसके लिए हर पीढ़ी को सबसे पहले इसे समझना पड़ता है, इसके लिए लड़ना पड़ता है, इसे बचा के रखना पड़ता है और अपनी आने वाली पीढ़ी को सौंपना होता है। आजादी को बचाने का एक आसान तरीका ये है कि हमारी जीवन शैली कुछ इस तरह से होनी चाहिए कि हम दूसरे के जीने के तरीके और उसकी आजादी, दोनों की कद्र करें। अगर अब्राहम लिंकन के शब्दों में कहें तो, “जो लोग दूसरों की आजादी छीनते हैं, वो खुद आजादी के लायक नहीं हैं।” इसलिए हमें हर हालात में अपनी आजादी के साथ साथ दूसरे की आजादी की भी सुरक्षा करनी चाहिए।

असली आजादी मन से है।

क्या हम अपने संविधान में दिए हुए सभी अधिकारों का पूरी तरह इस्तेमाल कर पाते हैं ?
ज्यादातर लोगों का उत्तर होगा, ‘ नहीं ‘। क्योंकि हमारे समाज को ऐसी बहुत सारी कुरीतियों ने जकड़ के रखा है जिसके चलते हम अपने ही समाज के डर से अपने अधिकारों का पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं। अंग्रेज़ी में एक कहावत है, ” ‘Should’ is a dangerous word.” और विश्वास मानिए बहुत ही खतरनाक शब्द है “चाहिए”। जहां भी ये शब्द आ जाए समझ जाइए आपके आजाद विचारों को खतरा शुरू हो गया है। यूं तो “चाहिए” शब्द उन सारी शिक्षाओं में आता है जो हमारे बड़े हमें सिखाते हैं। और चूंकि वो हमसे बड़े हैं, इसलिए वो सही ही कह रहे होंगे, यही सोचकर हम बचपन से ही उन सभी बातों को ज्यों का त्यों मानने लग जाते हैं, बिना किसी तर्क या वितर्क के। बस यहीं से हमारी आज़ाद सोच, पुरानी चली आ रही कुछ कुरीतियों के जाल में उलझ जाती है।
उदाहरण के तौर पर आप अपने आस पास की किसी भी पुरानी प्रथा, जो आपको गलत लगती है, को देख लीजिए। आप उसे मानते हैं क्योंकि बचपन से आपको सिखाया गया है कि मानना चाहिए। ध्यान दीजिए, ये वही “चाहिए” शब्द है जो बहुत खतरनाक है। “चाहिए” शब्द पर खत्म होने वाले बहुत सारे वाक्य ऐसे हैं जो पुरानी कुरीतियों को अपने साथ लेकर चले आ रहे हैं और हमारी आजाद सोच को अपाहिज़ बना रहे हैं। इसलिए अगर आपको अपने मन से स्वतंत्र होना है तो हर उस वाक्य के बाद एक प्रश्नवाचक चिन्ह लगा दीजिये जिसका अंत ‘चाहिए’ शब्द से होता है। और इस वाक्य के बारे में एक बार जरूर सोचिये कि कहीं आप किसी रूढ़िवादी विचारधारा के शिकार तो नहीं हो रहे हैं ।