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क्या खाकी की कैप बन गयी वाहन पास ?? सोचनीय विषय

राजसत्ता पोस्ट

आपबीती

आज मुजफ्फरनगर से गुड़गांव की यात्रा अपनी गाड़ी से करते हुए बड़ी विशेष स्तिथि देखी और समझी , ऐसा नही है की आज से पूर्व ऐसा देखा नही था पर इसका प्रयोग इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है इसका अंदाजा नही था। अमूमन ये आम सी दिखने वाली घटना इतनी विशेष क्यो थी , जानिए ,

अमूमन हम निजी गाड़ियों , बाइको पर उन सरकारी विभागो का नाम अंकित देखते है , जिनमे या तो वाहन स्वामी या उनका कोई परिजन कार्यरत होता है ,कुछ वाहनों पर जाति आदि लिखे देखा जाता है  , सरकारी वाहनों पर सरकार और विभाग का नाम अंकित होता  है , पर आज सफर के दौरान कम से कम 20 निजी गाड़ियों में आगे की तरफ डेस्क बोर्ड पर पुलिस की कैप रखी देखी , ये देखना भी विशेष नही पर आज जब विचार किया तो ये वाकई अनूठा था , 20 में से करीबन 7-8 गाड़ियां युवा चला रहे थे , जो किसी भी तरह पुलिसकर्मी नही लग रहे थे, सब गाड़िया अलग अलग प्रदेशो के नम्बर की थी और सबसे विशेष बात यह की उत्तर प्रदेश ,दिल्ली व उसके बाद हरियाणा में भी सिर्फ गाड़ियों के नम्बर बदले , ये विशेषता नही , इंस्पेक्टर से लेकर सिपाही तक कि कैप गाड़ियों की शोभा बढती नजर आयी।
अधिक गम्भीरता से विचार किया तो इसके दुष्परिणाम पर भी नजर गयी , यदि स्वयं कोई विभाग के अधिकारीगण या कर्मचारी वाहन चला रहे होंगे तो उनके पास उनका विभागीय परिचय पत्र भी अवश्य होना चाहिए , जिससे उनकी पहचान सुनिश्चित की जा सकती है ।
दूसरा यदि वाहन पुलिस विभाग के किसी अधिकारी या कर्मचारी के परिजन चला रहे है तो पुलिस की पहचान वर्दी की कैप रखने का कारण क्या है ?
क्या ये वर्दी का बेजा इस्तेमाल नही या  चैकिंग के लिए सिर्फ आम लोग अधिकृत है ??

कुल मिलाकर निष्कर्ष ये निकला की हर प्रदेश में ये एक कल्चर बन गया ,ऐसा कल्चर जो की समाज के लिए घातक भी सिद्ध हो सकता है , गाहे बगाहे ऐसी वारदाते देखने को भी मिली है जिसमे बदमाशो द्वारा पुलिस की वर्दी का इस्तेमाल करके आपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया गया है , अगर ये कल्चर बिना रोक टोक इसी प्रकार चलता रहा तो ये पुलिसिया साख के लिए भी बेहतर संकेत नही है।

विजित त्यागी