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सच्ची जीत

दुख के काले लबादे में
हल्का सा सुराख..
सुख को आमंत्रण देता
हुआ सा लगता है..

असंभव को संभव कर
दिखाना ही खेल है नियति
का, चारों ओर बिख़रा हुआ
घुप्प अंधेरा, सूचक है कि..

भोर होगी यकीनन…

संशय और भ्रम की स्थिति
अक्सर गिरा देती है..
मनोबल अंदर का, माना
कुछ वक्त के लिए ठहर
जाता है जीवन…

पर क्या?

कोई रोक पाया है रफ्तार
वक्त की, दिन_रात के इस
फेर ने तो सदियां बदल
कर रख दीं…और इतिहास
रच डाला….

अकारण, खुद को कुंठाओं के
गहरे जाल में फांस कर रखना

उचित है क्या?

आज को बखूबी जीकर
ही दे पाएंगे हम, इन तारीखों
को अविस्मरणीय यादें..

बीते हुए कल की घुटी हुई
यादों को जड़ से उखाड़ कर
फेंक देना ही जीत है सच्ची।
निधि भार्गव मानवी