कुछ और भी थी मेरी भेजी प्रेम कविता में तुमनें देखा..

कुछ और भी थी
मेरी भेजी प्रेम कविता में
तुमनें देखा..
सिर्फ शब्दों को
और कर दिया परे…

चाहत थी कितनी

भरी रात की नींद का
उधार मांगूगी ,
तुम्हारी आँखों मे
अपने लिखे प्रेम
आकूँगी ….

जैसे झड़ी थी कलियां
बिखरे थे मोती
तुम्हें लिखते हुए..
कितनी सिकुड़ी थी
सांसे…

भरी उम्मीद से
तकती रही पलकें
कि बरसाओगे
प्रेम -प्रवाह में
फूलो की कलियां
अपनी स्वर लहरी से…
चूम लोगे ,भर लोगे अंक अपने

निहाल हो जाते सपने

जो लिख दिया था हमने
प्रेम सीमा से परे
तुम्हारे-हमारे जीवन की कविता
श्वेता ..

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