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केंद्र सरकार द्वारा किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य दिलाने के लिए कुछ क़ानूनी प्रावधान करने चाहिए – अशोक बालियान

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केंद्र सरकार द्वारा किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य दिलाने के लिए कुछ क़ानूनी प्रावधान करने चाहिए – अशोक बालियान
इन दिनों कडाके की सर्दी में किसान दिल्ली की सीमा पर आंदोलनरत है। इस आन्दोलन में भारतीय किसान यूनियन की चिंताए किसान हित की है और हम उम्मीद करते है कि केंद्र सरकार व् किसान संगठनों के बीच जल्द ही पुन: वार्ता होकर समाधान निकलेगा।
भारत में कृषि को एक जोखिम भरा व्यवसाय माना जाता है। किसानों को फसलों के रोपण से लेकर अपने उत्पादों के लिये बाज़ार खोजने तक जोखिमों का सामना करना पड़ता है। कीमतों में जोखिम का मुख्य कारण पारिश्रमिक लागत से भी कम आय, बाज़ार की अनुपस्थिति और बिचौलियों द्वारा अत्यधिक मुनाफा कमाना है। और ये कारक फसल उत्पादन, मौसम की अनिश्चितता, फसल की कीमत, ऋण और नीतिगत फैसलों से भी जुड़े हैं।
राष्ट्रीय कृषि बाज़ार को मूर्त रूप देना इसका दीर्घकालिक समाधान है, और यह समाधान अनुबंध खेती से, कस्बों और शहरों में प्रत्यक्ष बिक्री के साथ जोड़ने से और बेहतर हो सकता है। इसीलिए केंद्र सरकार ने कृषि में सुधार के लिए तीन कानून बनाये है, जो किसान हित में है।
केंद्र सरकार द्वारा 23 कृषि फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की संस्तुति पर वर्ष में दो बार रबी और खरीफ के मौसम में की जाती है। और धान और गेहूँ के लिये खरीद नीति तय की गई है, जो सीधे पीडीएस से जुड़ी हुई है।
एमएसपी का आकलन करने के लिए सीएसीपी खेती की लागत को तीन भागों में बांटता है। ए2, ए2+एफएल और सी2, ए2 में फसल उत्पादन के लिए किसानों द्वारा किए गए सभी तरह के नकदी खर्च जैसे- बीज, खाद, ईंधन और सिंचाई आदि की लागत शामिल होती है जबकि ए2+एफएल में नकद खर्च के साथ पारिवारि श्रम यानी फसल उत्पादन लागत में किसान परिवार का अनुमानित मेहनताना भी जोड़ा जाता है।
केंद्र सरकार ने स्वामीनाथन रिपोर्ट को काफी हद तक लागू कर दिया था लेकिन अभी फसल की लागत पर जो एमएसपी तय किया जा रहा है, वह ए2+एफएल है। किसानों की मांग है कि इसमें सी2 जोडकर एमएसपी तय किया जाए। किसानों की यह मांग उचित है।
बाजार हस्तक्षेप योजना (एमआईएस) उन कृषि उपज की खरीद के लिए, जो जल्दी खराब हो जाने वाली (जैसे आलू, मक्का व् प्याज आदि) प्रकृति की होती हैं और यह वहां की राज्य सरकार के अनुरोध पर लागू की जाती है। इसके अतिरिक्त जब भी तिलहन, दलहन और कपास की कीमतें एमएसपी से नीचे गिर जाती हैं, नेफेड पीएसएस के अंतर्गत की इनकी खरीद करती है। लेकिन यह योजना देर से शुरू की जाती है, तब तक अधिकतर किसान अपनी उपज सस्ते में बेच देते है। इस योजना को बेहतर किये जाने की आवश्यकता है।
अधिकांश फसलें वर्ष में एक बार ही काटी जाती हैं और शेष वर्ष के लिये संग्रहीत की जाती हैं। किसी न किसी को फसल का भण्डारण करना ही पड़ता है, अन्यथा इसे उपभोक्ताओं के लिये पूरे वर्ष उपलब्ध नहीं किया जा सकता है। कृषि में सुधार के लिए बनाये गये इन तीनों कानूनों से भण्डारण व्यवस्था में सुधार होगा, जिसका लाभ किसानों को भी मिलेगा।
किसानों की आय बढ़ाने के लिये सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिये था कि समस्याग्रस्त क्षेत्रों में सभी फसलों का बीमा जीरों प्रिमियम पर हो, और सभी कृषि ऋणों को बीमा से जोड़ा जाना चाहिये ताकि बैंक को ऋण हानि से सुरक्षा मिल सके व् इस स्थिति में किसान पर बोझ न पड़ें, लेकिन केंद्र सरकार ने किसान संगठनों की मांग पर इसको तय दरों पर ही स्वेच्छिक कर दिया है।
इस समय भी पंजाब के कुछ किसान संगठन मंडी से बहार कृषि उपज के व्यापर पर शुल्क लगाने की मांग कर रहे है और सरकार इसके लिए तैयार भी हो गई है, जबकि इसका नुकसान किसान को ही होगा। मंडी व् मंडी से बहार खरीद में शुल्क की एकरूपता के लिए मंडी शुल्क को समाप्त किया जाना चाहिए।
किसानों की सबसे बड़ी समस्या उन्हें फसल का सही मूल्य न मिलना है, इसलिए वे इस न्यूनतम समर्थन मूल्य की वर्तमान व्यवस्था में न्यूनतम बिक्री मूल्य से नीचे उनकी उपज न बिके, यह कानूनी प्रावधान मंडी के अंदर व् मंडी के बहार दोनों जगह चाहते है। किसान अपने कुछ अन्य कृषि उपज को मुख्य फल-सब्जी व् दूध सहित न्यूनतम समर्थन मूल्य की सूचि में सम्मलित भी कराना चाहते है। यह मांग उचित है।
पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन का कहना है कि केंद्र सरकार को उपरोक्त पर अति शीघ्र विचार कर उचित निर्णय करना चाहिए।