थियेटर, ख़ानदानी अहं, दावँ-पेंच और अनैतिक सम्बंध के दुखद परिणति की कहानी :- नौशाद
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‘नौशाद’ थियेटर जगत की पृष्ठभूमि वाला उपन्यास है,एक नव विधवा पर पारिवारिक दबाव, संपति के उद्देश्य से पारिवारिक कलह की शिकार और बेदख़ल, नैसर्गिकता को रोकता दिख रहा रीति-रिवाज को तोड़ने और अनैतिक सम्बंध के अंत की कहानी है।
जीवन के नैसर्गिक मार्ग को अवरुद्ध करना ही विवाद-अवसाद और कलह का कारण होता है। प्रेम के पास आँखे नहीं होती, तर्क नहीं होता, समर्पण होता है और वह न शोहरत देखता है न ख़ानदान के क़द को ध्यान में रखता है,समर्पण मतलब समर्पण।
इस उपन्यास की नायिका सशक्त और बेबाक़ है पर उतनी ही कोमल भी, थियेटर जगत के प्रसिद्ध व्यक्ति से उसकी शादी होती है, जल्द ही बेवा बन जाती है और पारिवारिक कलह के बीच दूर देश लन्दन में बसने के बाद एक प्रोग्राम में उसे हिंदुस्तान बुलाया जाता है और यहाँ वो फिर से एक बार हालात वश थियेटर के प्रोफ़ेसर और प्रोग्राम के आयोजक से प्रेम सम्बंध की शुरुआत होती है, प्रोफ़ेसर अपने बीबी-बच्चे और माशूक़ा के बीच मोहांध हो कुछ भी निर्णय लेने में असक्त हो आत्महत्या कर लेता है।
ये तो उपन्यास का मोटा-माटी कहानी है पर और भी बहुत कुछ है, स्त्री की स्वाभिमान है, चारित्रिक बलिष्ठता है, कहानी का अपना सम्वेदनीय प्रवाह है और जब थियेटर जगत की कहानी है तो शेरों-शायरी,विश्व साहित्य के साहित्यकार और कृतियों का उद्धरण तो होगा ही।एक उपन्यास में महज़ जो चीजें होनी चाहिये उसे अच्छा बनाने के लिये वो सब कुछ है “नौशाद” में।सबसे अलग बात यह है कि, उपन्यास का एक किरदार अलग-अलग जगहों पर आता रहता है और वो अंत तक है जबकि वो ज़िंदा नहीं है।

युवा उपन्यासकार “भूमिका द्विवेदी” का यह उपन्यास इसी वर्ष २०२१ में आया है।लेखिका की लगभग रचनाओं को मैंने पढ़ा है, भाषा का अद्भुत प्रवाह, अलंकारों का सटीक प्रयोग, कहानी में घटनाओं की क्रमबद्धता प्रभृति इनकी लेखनी के समृद्धि का द्योतक है। एक सामंतवादी ब्राह्मण परिवार की लड़की का उर्दू वातावरण, रीति-रीवाज़ों और भाषागत साहित्यिक समृद्धि और जबरदस्त कुशल प्रयोग अचंभित करता है. डायमंड पॉकेट बुक्स से छपे इस उपन्यास में कहीं-कहीं शब्दों में प्रूफ की अशुद्धियाँ है जिसे हम आशा करते है कि प्रकाशक अगले संस्करण में सुधार लेंगे।
लेखिका और प्रकाशक को अनंत मंगलकामनाएँ।


✍️ राघवेंद्र

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