अशोक बालियान चेयरमैन,पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन

संयुक्त किसान मोर्चा ने अपने स्वार्थ में किसान हित के कृषि कानूनों में किसान की जमीन छिनने की बात कहकर किसानों को धोखा दिया था, क्योकि कृषि कानून देश के उन छोटे किसानों के हित में भी थे, जो अपनी उपज मंडियों तक नहीं ला पाते हैं। हम अपनी इस पोस्ट में कृषि करार कानून अर्थात ‘कृषक कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020’ पर कानून में दिए गए प्रावधान या सेक्शन के साथ बात करेंगे, ताकि इन तथाकथित किसानों का असली चेहरा किसान पहचान सके। ये किसान नेता आज भी किसानों की जमीन छिनने का भय दिखा रहे है और खुद जमीनें खरीद रहे है। ये किसान नेता ये भी कहते है कि मोदी सरकार में किसान बर्बाद हो गया है, जबकि मोदी सरकार पीएम किसान योजना के तहत वर्ष 2018 से किसानों को 2.50 लाख करोड़ रूपये सहायता के रूप में दे चुकी है।
कृषि करार कानून अर्थात ‘कृषक कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020’ के तहत देशभर के किसान बुआई से पहले ही लाभकारी कीमत पर अपनी फसल निर्यातकों, थोक विकेर्ताओं, प्रोसिसिंग उद्योगों व कृषि कारोबार करने वाली फर्मों को बेच सकते थे। इस प्रकार किसानों को फसल तैयार होने के बाद खरीदारों को जगह-जगह जाकर ढूंढने की भी जरूरत नहीं थी। और किसानों की पहुंच बड़े कारोबारियों और निर्यातकों तक बढ़ जाती।
लेकिन देश के कुछ कथित किसान नेताओं ने इस कानून को काला कानून बताया था, लेकिन उन्होंने कभी भी इस कानून में काला क्या है ये नहीं बताया। इन कुछ कथित किसान नेताओं ने किसानों के बीच मौखिक रूप से जमीन छीन जाने की बात व कुछ अन्य बात कही थी हमने उन्ही बातों का कानून की धाराए या सेक्शन के साथ उनके झूठ का पर्दाफाश किया है।
संयुक्त किसान मोर्चे व् विपक्ष का कहना था कि कृषि करार कानून से किसानों की जमीन छीन जायेगी। और करार करने वाला उसकी जमीन पर ऋण ले सकता है।
जबकि कृषि करार कानून के सेक्सन 8 में स्पष्ट है कि करार करने वाला कृषक की भूमि के विक्रय या उसका पट्टा और भूमि के बंधक का करार नही कर सकता है। संयुक्त किसान मोर्चे द्वारा यह भ्रम फैलाया जा रहा है।
संयुक्त किसान मोर्चे व् विपक्ष का कहना था कि कृषि करार कानून से करार करने वाला अपनी रकम की वसूली के लिए किसानों की जमीन नीलम करा सकता है।
जबकि कृषि करार कानून के सेक्सन 15 में स्पष्ट है कि कृषि करार कानून से करार करने वाला अपनी रकम की वसूली के लिए किसानों की जमीन नीलम नहीं करा सकता है।
संयुक्त किसान मोर्चे व् विपक्ष कहना था कि कृषि करार कानून में करार करने वाला फसल अच्छी क्वालिटी की न होने पर फसल लेने से मना कर सकता है।
जबकि कृषि करार कानून (कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020) के सेक्सन 6 में स्पष्ट है कि करार करने वाला कृषक की भूमि पर फसल का समय-समय पर निरिक्षण करेगा और उसके पश्चात उसे फसल लेने से मना करने का अधिकार नही होगा।
संयुक्त किसान मोर्चे व् विपक्ष का कहना था कि कृषि करार कानून से किसानों न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिलेगा।
जबकि कृषि करार कानून के सेक्सन 5 के उप सेक्सन (क) के तहत किसान को सर्वोत्तम मूल्य मिलेगा व सेक्सन 5 के उप सेक्सन (ख) के तहत किसान को बोनस भी मिलेगा और उसे इस मूल्य को उपयुक्त कीमतों से जोड़ा जायेगा।

संयुक्त किसान मोर्चे व् विपक्ष कहना था कि कृषि करार कानून में करार करने वाला किसान को निम्न अर्थात नीचे का बाजार भाव का मूल्य देने का करार कर सकता है।
जबकि कृषि करार कानून के सेक्सन 5 में स्पष्ट है कि करार करने वाला किसान की सहमति के साथ किसान को बाजार भाव का सर्वोत्तम मूल्य देने का ही करार कर सकता है।
संयुक्त किसान मोर्चे व् विपक्ष कहना था कि कृषि करार कानून में करार करने वाला फसल खराब या दैवीय आपदा से खराब होने पर किसान को करार में तय रकम देने से मना कर सकता है, जिससे किसान को नुकसान होगा।
जबकि कृषि करार कानून के सेक्सन 6 के उप सेक्सन 2 में स्पष्ट था कि करार करने वाला किसान के उत्पाद को फसल खराब बताकर लेने से मुकरने का अधिकार नहीं होगा।कृषि करार कानून के सेक्सन 9 में स्पष्ट है कि करार करने वाला बोई गई उपज का बीमा कराएगा ताकि किसान या प्रायोजक या दोनों की जोखिम न रहे।
संयुक्त किसान मोर्चे व् विपक्ष कहना था कि कृषि करार कानून में विवाद होने पर किसान न्यायलय में नही जा सकता है।
जबकि कृषि करार कानून के सेक्सन 14 में स्पष्ट था कि विवाद होने पर कोई भी पक्ष सुलह बोर्ड जिसमे किसान प्रतिनिधि भी होने उसमे शिकायत कर सकता है। या सुलह बोर्ड के गठन न होने पर उप खंड मजिष्ट्रेट को अपनी शिकायत कर सकता है। इसके बाद कलेक्टर या उससे उपर की कोर्ट में जा सकता है। भारत में कृषि भूमि सम्बन्धित सभी विवाद उप खंड मजिष्ट्रेट कोर्ट से ही शुरू होते है और हाई कोर्ट व् सुप्रीम कोर्ट तक जा सकते है। यही व्यवस्था इस कानून में थी।
ये किसान नेता सिर्फ किसान आंदोलन तक ही सीमित नहीं है, ये किसान नेता जम्मू-कश्मीर में धारा 370 के बारे में भी बात करते है, ये इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर भी बोलते है। ये किसान नेता किसी न किसी तरह से मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए वर्ष 2024 तक किसी न किसी रूप में आंदोलन चलाना चाहते हैं और इनके छिपे हुए एजेंडे कुछ और है।
ये किसान नेता देश में लोकतंत्र खत्म होने की बात भी करते है, जबकि दिल्ली आन्दोलन के दौरान 26 जनवरी को इन्होने दिल्ली में भारी हिंसा की थी व 400 पुलिसकर्मियों के घायल हो जाने के बाद भी मोदी सरकार ने आज तक संयम का परिचय दिया है। कांग्रेस पार्टी व अन्य विपक्षी पार्टियाँ इन किसान नेताओं की हिमायती बन रही है जिन्होंने अपने शासन काल मे किसानों पर गोलियां तक चला दी थी, जबकि मोदी सरकार ने अभी तक इन कथित किसान नेताओं पर एक लाठी तक नही चलाई है। किसान का पार्टी बताने वाले नेता जयंत चौधरी ने भी अपने स्वार्थ में इन कृषि कानूनों को काला कानून बताया था।इसलिए किसानों को इसकी निति भी पहचाननी होगी और यह समझना होगा कि यह नेता उनके नाम को दिखाकर अपने स्वार्थ के लिए गठबंधन करता है।
जिस तरह विदेशी नागरिकता अधिनियम देश के सभी मुसलमानों की नागरिकता छीन रहा था, वैसे ही कृषि करार कानून अर्थात (कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020) भारतीय किसानों की जमीन छीनकर अंबानी और अदानी को दे देगा। अंबानी और अदानी किसानों की फसल को मुफ्त लूट ले जाएंगे। यह व्यंग इनपर फिट बैठता है, इसलिए किसानों को इनसे सावधान रहने की जरूरत है।
ये कथित किसान नेता कहते थे कि केंद्र सरकार को इन कानूनों का बनाने का अधिकार नहीं है, इब्की इन्हें पता होना चाहिए था कि समवर्ती सूची की प्रविष्टि-33 जहाँ एक ओर कृषि विषयों पर राज्यों की शक्ति को सीमित करती है, वहीं दूसरी ओर केंद्र को यह अधिकार देते हुए शक्तिमय बनाती है कि वह कृषि उत्पादन, कृषि-व्यापार, खाद्यान्न वितरण और कृषि उत्पाद संबंधी मामलों पर विधि बना सकती है।

जबकि मोदी सरकार ने अभी तक इन कथित किसान नेताओं पर एक लाठी तक नही चलाई है। किसान का पार्टी बताने वाले नेता जयंत चौधरी ने भी अपने स्वार्थ में इन कृषि कानूनों को काला कानून बताया था।इसलिए किसानों को इसकी निति भी पहचाननी होगी और यह समझना होगा कि यह नेता उनके नाम को दिखाकर अपने स्वार्थ के लिए गठबंधन करता है।
जिस तरह विदेशी नागरिकता अधिनियम देश के सभी मुसलमानों की नागरिकता छीन रहा था, वैसे ही कृषि करार कानून अर्थात (कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020) भारतीय किसानों की जमीन छीनकर अंबानी और अदानी को दे देगा। अंबानी और अदानी किसानों की फसल को मुफ्त लूट ले जाएंगे। यह व्यंग इनपर फिट बैठता है, इसलिए किसानों को इनसे सावधान रहने की जरूरत है।
ये कथित किसान नेता कहते थे कि केंद्र सरकार को इन कानूनों का बनाने का अधिकार नहीं है, इब्की इन्हें पता होना चाहिए था कि समवर्ती सूची की प्रविष्टि-33 जहाँ एक ओर कृषि विषयों पर राज्यों की शक्ति को सीमित करती है, वहीं दूसरी ओर केंद्र को यह अधिकार देते हुए शक्तिमय बनाती है कि वह कृषि उत्पादन, कृषि-व्यापार, खाद्यान्न वितरण और कृषि उत्पाद संबंधी मामलों पर विधि बना सकती है।

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