Home कविता/शायरी वो भोर नयी

वो भोर नयी

कितना भारी दिन है
उदासीन लम्हों को
बटोर कर…
जबरन मढ़ लिया है
पेशानी की लकीरों में

निराशाओं के मटमैले
खोल में छिपा जिस्म
पैबंद लगी अभिलाषाएं
श्रम और स्वेद से निस्तेज हो
निढाल पड़ा है एक ओर

कुंठाओं का अकारण
बोझ लादे तकदीर
भी रूठ कर मातम सा
मनाने लगी है अब तो

ऐसे में एक किरण
उम्मीद की प्रस्फुटित
होती दिखाई देती है
रक्तिम आभा लिए
सूरज की उंगली थाम
भोर उतर रही है हौले होले
मन आंगन में…

वो देखो किरणें बुनने लगीं है
ऊर्जाओं से ओत प्रोत ख़्वाब
अब रोपित होंगी दिल की
जमीन पर उमंगें नयीं।

निधि भार्गव मानवी