वो मसीहा
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नज़्म मुक्तछंद
रास्ते वीरान थे सूखे पत्ते कदमों के नीचे चुभते टूटते कुछ खरोंचे देते और फिर सब कुछ शान्त हो जाता दूर पेड़ पर एक नया पत्ता हरा भरा मुस्कान लिए हल्की सी पुरवाई से चहक जाता कभी मेरी तन्हाई से मचल जाता कभी हवा के साथ अठखेली करता धीरे धीरे मेरे अकेलेपन का साथी बन मेरा सहारा मेरी आस बन बैठा..न जाने क्या आकर्षण था उसमें मैं दूर से उसे निहारती पुकारती अपनी सारी बातें उससे बाँटती .मगर फिर भी बहुत कुछ छुपाती लजाती ..शायद डरती थी मैं उन सूखी कठोर टहनियों से जो मेरे चारों ओर फैली थी मेरे हाथ पैर जिनसे उलझे हुए थे.और वो जीवनदायी पत्ता अपने आस पास के सभी पत्ते धीरे धीरे हरे कर जीवन बाँटता जा रहा था मेरे होने का अहसास उसे हो न हो उसके होने की खुशी मेरी आँखों मे साफ़ दिख रही थी शायद पुनर्जन्म के किसी रिश्ते ने हमें बाँध रक्खा था या फिर मैनें खुद ही खुद को एक भ्रम में रक्खा था सोचती हूं कल मैं रहूं न रहू पर वो मसीहा यू ही हरा भरा रहे और यू ही सबको अपने रंग में रँगता रहें..
@✍️मनीषा जोशी मनी..

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