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स्वामी सहजानंद सरस्वती आध्यात्मिक गुरु के साथ-साथ शोषितों की क्रान्तिकारी आवाज भी थे

आमतौर पर सन्यासी शब्द से मन में जो बिंब उभरता है, वह शिखा सूत्र धारी त्यागी, गैरिक वस्त्रधारी घर-वार से विरक्त और माया के सभी बन्धनों से मुक्त तथा निरन्तर आध्यात्मिक चिंतन में लीन रहने वाला व्यक्ति।

एक महान क्रांतिकारी सन्यासी ,वैज्ञानिक समाजवादी, जननायक स्वामी सहजानन्द सरस्वती, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा, किसान आंदोलन के जनक, पीड़ितों के मसीहा सम्पूर्ण भारतीय वाङ्गमय के अत्यंत ही गंभीर अध्येता और राजगुरू मठ शंकराचार्य परम्परा के थे दण्डी सन्यासी स्वामी सहजानन्द सरस्वती ।

स्वामी सहजानन्द ने अपने जीवन से यह स्पष्ट कर दिया कि सन्यासी होकर भौतिक समस्याओं से जुझना उसके निदान के लिए अनबरत प्रयत्नशील रहना तथा लोक कल्याणकारी भावनाओं से जीवन संघर्ष करने में जीवन की सच्ची सार्थकता है।

स्वामी जी ने उस समय के सन्यासियों से भिन्न मार्ग अपनाया । उन्होंने शोषित-पीड़ित जनता के भौतिक उत्थान में गतिरोध उत्पन्न करनेवाले सभी तत्वों का क्रियात्मक विरोध करते हुए एक क्रांतिकारी जननायक की भांति राजनीतिक संघर्षों का मार्ग प्रशस्त किया।

एक और घर और परिवार के झंझटों से मुक्त , दूसरी और सम्पूर्ण समाज, देश और मानवता, विशेष रूप से शोषित, पीड़ित और दलितों को स्वजन मानकर उनके अधिकारों के लिए संघर्ष-यह स्वामी जी की सच्ची पहचान है। दिनकर जी स्वामी जी के लिए लिखते हैं –

निज से विरत,सकल मानवता, के हित में अनुरत वह।

निज कदमों से ठुकराता मणि, मुक्ता स्वर्ण रजत वह।।

आया है नव पथ दिखलाने, दलितों का सन्यासी ।।

सेवा, वैराग्य और बलिदान भारतीय संस्कृति की उपलब्धियों के शिखर है। इन गुणों के प्रतीक स्वामी जी आधुुुनिक भारत के उन महापुुुरुषों की परम्परा में आते है, जिनका सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित था ।

 

लेखक: बजरंग पारीक