Home कविता/शायरी ब्याहता

ब्याहता

एक आंसू गिरा
आंखों से झर कर
हृदय भीग गया था
पर डर था
आँचल का कोना भीग कर
सवाल न खड़ा कर दे
की स्त्री का मन भी
कोई टटोल सका है?
इसलिए छुपा लिया आंसू
पलकों की सरहद में ही
कि एक बूंद
जिसमे घुले थे
कितने, ताने, झिड़कियां, यातनाएं
बहुत कुछ कह जाते
पर ये कहना भी बस
माँ का हृदय ही दुखाता
क्योंकि ब्याहता का
घर ससुराल ही होता है
भले वो कारागार हो
या उससे कम

सिम्मी हसन
बेल्थरा रोड़ बलिया
यूपी