तो एक गाँधी था मुल्क में जो उठा के लाठी चला था लड़ने बमों से

खबरे सुने

अपना वतन
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तो एक गाँधी था
मुल्क में
जो उठा के लाठी
चला था लड़ने
बमों से
फाँसी
मशीनगन से
ब्रीतानी-चालाकियों
के फ़न से
वो एक लाठी
जिसे सहारा बनाया
लेकिन फ़क़त
क़दम दर क़दम मिलाने
उसे क़सम थी-
“उठे न भिड़ने
गिरे न सर पर
किसी भी सूरत
तनी रहे पर
झुके न खाकर
हज़ार ठोकर!”

तो एक गांधी था
मुल्क में
जो चला के चरखा
घुमा के तकली
बदल रहा था
वतन की क़िस्मत
विदेशी कपड़ो
को फूँक कर के
बदन पे डाली
कफ़न सी धोती
वतन की गलियों में
घूमता था
जो हल उठाए
किसान मिलते
वो उनके पैरों को
चूमता था
उसे यकीं था
कि मुल्क भारत
किसान की झोपड़ी में रहता
वो गाँव की
ताज़गी में रहता
वो मुफलिसी
बेबसी में रहता!
उसी वतन को
जगा रहा था
उठा रहा था
बता रहा था-
“चलो! बढो!
इन्कलाब लाओ!
स्वदेशी हो कर
स्वदेश पाओ!
विदेशी शासन
नहीं ध्वजा भर
वो संस्कृति पर चली छुरी है
ये मुल्क अपना
बना है मिलकर
मिलाप इसका चलन रहा है
अगर छुरी को नहीं हटाया
तो ये ‘मिलन का चलन’ मिटेगा
बदल भी दोगे
अगर ध्वजाएं
तुम्हे न ‘अपना-वतन’ मिलेगा!”


ओमा The अक्क

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