छोटी हुई दुशाला

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बिखरे बिखरे मन के सीपी बिखरी मन की माला है.
कैसे समेटू पीड़ाओं को छोटी हुई दुशाला है..

व्याकुलता पल पल बढ़ती है कटु वेदना मानस पर.
ठोकर लगी है इन घाँवों को फूटा अभी ये छाला है..
बिखरे बिखरे…
रात घनी है पथ में काँटें चलना पर मजबूरी है.
हिम्मत से ही तय करनी है मंज़िल से जो दूरी है.
नीली ग्रीवा होने तक हम कष्टों से संघर्ष करें .
मन मंदिर में बसा के शिव को पीना विष का प्याला है.
बिखरे बिखरे…
प्रतिमानों को रखकर मन में कर्तव्यों को करना है .
नानक के पथ चिन्हों पे चल हमको आगे बढ़ना है..
पैरों को बंधन ने घेरा इच्छाओं को बाँध लिया ..
संघर्षों ने ही साधक को नारायण में ढाला है..
बिखरे बिखरे मन के मोती बिखरी मन की माला है.
कैसे समेटू पीड़ाओ को छोटी हुई दुशाला है..
मनीषा जोशी मनी..

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