Home कविता/शायरी आकाश….

आकाश….

इंसान को उसकी औकात बता देता है जैसे कहता हो कितना भी गुरुर हो तुझे खुद पर, लेकिन मुझसे बड़ा तू कभी नही हो सकता…

सच्ची मानवता वही है जिसे खुद पर लेशमात्र भी गुरुर न हो। गुरूर इंसान को हमेशा गिराता है।

विशालहृदय, सहज, सरल व्यक्तित्व ही लोगों के दिलों में हमेशा के लिए अपना घर बना पाता है।

किसी को नीचा दिखाने की सोच ही कितनी नीचे गिरी हुई है। स्पर्धा और झूठे आडंबर इंसान की गरिमा को पलभर में धूल चटा देते हैं।

मृत्यूपरांत मनुष्य का शरीर तो जलकर खाक हो जाएगा परंतु उसका किया हुआ व्यवहार ही उसे लोगों के बीच ज़िंदा रखेगा
इसीलिए जीते जी ऐसे कर्म करने चाहिए जिससे कि हम मरने के बाद भी ज़िंदा रह सकें। इसी भाव को दर्शाती हुई अपनी चार पंक्तियाँ पाठकों को समर्पित करती हूं।

मुझको जीना है मरने के बाद “निधि”
ये मेरी अंतिम समझो फरियाद “निधि”
मर जाऊंगी मैं भी ओरों की तरह
पर मुझको रक्खे हर पल दुनिया याद“निधि”

निधि भार्गव मानवी