अकेली औरत..
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अकेली औरत..
 जहाँ भाई, पिता ,पति के साथ होते हुए भी सुरक्षित नही औरत फिर वहाँ  कैसे जिये अकेली औरत इस दुनिया में..

जहां हर तरफ़ गिद्ध सी नज़रों वाले दैत्य माँस नोचने को लालायित आँखे लिये बैठे है..

हर चौराहे में दुकानों में सब्जी मंडी में यहाँ तक की मंदिर मस्जिद और अस्पतालों में भी...

जो नज़रों से ही चीड़ फाड़ कर लहू लुहान कर देते है उस अकेली औरत की आत्मा को....

लोग बचते रहे कोरोना में दो गज की दूरी रख कर  बनाते रहे तन से दूरी मगर सिर्फ़ अपनी सुविधा अनुसार..

कितनी ही अकेली औरतें इस कोरोना काल में भी इन गिद्धों से न बच पाई. देह की दूरी तो दूर उनकी देह भी न बचा पाई ये मानव रूपी वायरस से... .

ये हवस का वायरस बड़ी आसानी से करता आ रहा है वर्षों से शिकार स्त्री जाति का कभी अश्लील शब्दों से कभी अश्लील नज़रों से कभी अश्लील हरकतों से बेधता आ रहा है स्त्री का तन मन यहाँ तक की आत्मा भी मगर कोई नही बनाता इसकी रोकथाम की वैक्सीन. जिससे किसी भी वक़्त कोई भी काम के लिए निकल पाती घर से बाहर .

अकेली औरत..


मनीषा जोशी..

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