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देश की माटी के लिए एक साथ तीनों वीर सपूतों ने हँसते- हँसते फांसी को माला की तरह गले लगा लिया

खून से खेलेंगे होली वतन अगर मुश्किल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है

अंग्रेजो के अत्याचार से भारत को मुक्त करवाने और गुलामी की जंजीरों में जकड़ी हुई भारत माता को आजादकरवाने के लिए अनगिनत वीरों ने अपने प्राणों की बाज़ी लगा दी । उन्ही पूज्यनीय वीरों में से तीन ऐसे महान वीर सपूत थे जिन्हे आज के ही दिन 90 वर्ष पूर्व फांसी पर लटका दिया गया था । वे थे भगत सिंह जी , सुखदेव जी एवम राजगुरु जी । इनका अपराध सिर्फ इतना था कि इन्होंने बिना डरे अंग्रेजी हुकूमत से लोहा ले लिया था।इनका अपराध ये था कि इन्होंने गुलामी की बेड़ियों में बंधे लोगों को आजादी दिलवाने का प्रण ले लिया था ।

जब देश में थी दीवाली,

वो खेल रहे थे होली,

जब हम बैठे थे घरों में,

वे झेल रहे थे गोली

भगत सिंह जी अपने निर्भीक व्यक्तित्व और साहसी कारनामों के कारण युवाओं में अत्यधिक प्रसिद्ध थे और आज भी है। उन्होंने 8 अप्रैल 1929 को इंकलाब का नारा लगाते हुए अपने साथियों के साथ असेंबली हाल में बॉम्ब फोड़ दिया था और भागने का मौका होते हुए भी वह से नही भागे क्योंकि वो कोर्ट को अपनी अभिव्यक्ति का एक माध्यम बनाना चाहते थे जहा से वो पूरे देश को जागरूक कर सके और सबको आजादी की लड़ाई में अपनी भूमिका निभाने के लिए प्रेरित कर सके। ये पूछे जाने पर कि उन्होंने असेंबली हॉल में बॉम्ब क्यों फोड़ा – उन्होंने जवाब दिया कि वो चाहते है बहरी अंग्रेजी हुकूमत के कान खुले और वो आम जनता की आवाज को उनकी मांगों को सुने।
भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरु जी ने जेल में कैदियों के खाने योग्य खाना ,साफ कपड़े , पढ़ने के लिए किताबों को उपलब्ध कराने के लिए आमरण भूख हरताल की थी । अंत में अंग्रेजी सरकार को उनके समक्ष घुटने टेकने पड़े और उनकी सारी मांगो को स्वीकार करना पड़ा।

भगत सिंह और उनके साथियों को 24 मार्च 1931 को फांसी दी जाने वाली थी ।चूंकि इनकी ख्याति लोगो में इतनी अधिक थी कि अंग्रेजी सरकार को भय था कि 24 मार्च को देश में भगत सिंह की फांसी रुकवाने के लिए दंगे हो सकते है इसीलिए कायर अंग्रेज़ी हुकूमत ने चोरी चुपके 23 मार्च की शाम 7:30 बजे भारत के तीनों महान सपूतों को फांसी पर लटका दिया।

मां भारती के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले भारत के इन महान सपूतों और इनकी जननी को हम आज सच्चे दिल से नमन करते है । भूत ,वर्तमान और भविष्य सदैव इनके बलिदान को याद करता रहेगा।

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा…

लेखिका: दीक्षा त्रिपाठी