Home कविता/शायरी “बाबा”

“बाबा”

बस वही एक चेहरा है
जाना पहचाना सा
जो मेरी उम्र के साथ
बदलता गया
शदाबी से
झुर्रियों तक
पर मेरे लिए
मुहब्बतों के रंग
कभी मुर्झा न सके
उस चेहरे से
मेरे बाबा
मेरे मुर्शिद भीं हैं
और पीर भी

सिम्मी हसन
बेल्थरा रोड, बलिया
यूपी