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यहूदियों का नरसंहार और परमाणु बम से तबाही के 67 साल बाद भी वैसा ही है हिरोशिमा और नागासाकी

राजसत्ता पोस्ट

 

जर्मनी में हिटलर की तानाशाही में हुआ यहूदियों का नरसंहार और परमाणु बम से तबाही के 67 साल बाद भी वैसा ही है हिरोशिमा और नागासाकी – अशोक बालियान

लेखक अशोक बालियान

वर्ष 1933 में अडोल्फ़ हिटलर जर्मनी की सत्ता में आया और उसने एक नस्लवादी साम्राज्य की स्थापना की, जिसमें यहूदियों को सब-ह्यूमन करार दिया गया और उन्हें इंसानी नस्ल का हिस्सा नहीं माना गया। वर्ष 1939 में जर्मनी द्वारा विश्व युद्ध भड़काने के बाद हिटलर ने यहूदियों को जड़ से मिटाने के लिए अपने अंतिम हल (फाइनल सोल्यूशन) को अमल में लाना शुरू किया। यहूदियों को यातना शिविरों में भेज दिया गया।


यूक्रेन के कीव शहर और आसपास के सभी यहूदियों को स्थानीय सुरक्षा गार्डों की निगरानी में उन्हें पैदल चलाकर शहर के बाहर स्थित बाबिन जार ले जाया गया,जहां उनसे सामान इकट्ठा करवाया गया और नंगा होने को कहा गया था और इस नरसंहार में पीछे से आने वाले यहूदियों को पहले मारे गए यहूदियों की लाशों पर लेटना पड़ता था और पीछे खड़े सैनिक उन्हें गोली मार देते थे। जर्मनी में हिटलर की तानाशाही में हुआ यहूदियों का नरसंहार जिसमें बड़ी संख्या में बच्चे और महिलाएं शामिल थीं, दुनिया के इतिहास में अब तक का सबसे जघन्य और नृशंस हत्याकांड है।


6 अगस्त 1945 व् 9 अगस्त 1945 को अमेरिकी परमाणु हमले में जापान के दो शहर हिरोशिमा और नागासाकी में मारे गए लोगों को पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन के पौत्र ने कुछ वर्ष पहले अपनी श्रद्धांजलि दी थी और उस दौरान वहां हुई मौतों पर अपनी चिंता और दुःख जाहिर किया था।
हिरोशिमा दुनिया का पहला ऎसा शहर है जहां अमेरिका ने 6 अगस्त 1945 में यूरेनियम बम गिराया था और इसके तीन दिन बाद यानी 9 अगस्त को नागासाकी पर परमाणु बम गिराया गया था। 6 अगस्त 1945 के दिन हिरोशिमा शहर में मौजूद लाखों लोगों की मौत हो गई थी। साथ ही जो बचे थे वो परमाणु बम के रेडिएशन के शिकार हो गए थे। 9 अगस्त को नागासाकी में परमाणु हमलें में 70,000 लोग मारे गये थे और लगभग इतने ही लोग इसके सक्रमण का शिकार हुए थे। अमेरिका दरअसल अपने सहयोगी देश के नेता स्टालिन को यह दिखाना चाहता था कि युद्ध के बाद दुनिया के भाग्य का फैसला कौन करेगा। और इसके लिए उसने लाखों जापानी नागरिकों के जीवन बलिदान कर दिए।
इन दो परमाणु हमले के 6 दिन बाद जापान के युद्ध मंत्री और सेना के अधिकारियों के खिलाफ जाते हुए प्रधानमंत्री बारोन कांतारो सुजुकी ने मित्र देशो के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। जापान दुनिया का एक मात्र ऐसा बदनसीब देश बन गया है जिसने परमाणु हमले को सहन किया है।
जापान का ये हिस्सा आज भी उस हमले से प्रभावित है। आज भी यहाँ पर उत्पन्न हो रही संतानों पर इस हमले का असर साफ देखा जा सकता है। हम यही कामना करते हैं कि भविष्य में ऐसा दोबारा न हो।