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सुधीर भारतीय जैसे कार्यकर्ताओ की भूमिका स्वीकारनी होगी (कृन)

 

राजसत्ता पोस्ट

सुधीर भारतीय जैसे कार्यकर्ताओ की भूमिका स्वीकारनी होगी (कृन)

2019 के मुज़फ्फरनगर लोकसभा सीट बराबरी की टक्कर के बाद भी मामूली वोटों से रालोद अध्यक्ष अजित सिंह चुनाव हार गए।
रालोद की रणनीतिक चूक, अति विश्वास और पार्टी में मौजूद जयचन्दों के चलते छोटे चौधरी हारे और शीर्ष नेतृत्व से जमीनी स्तर तक का कार्यकर्ता सदमे में आ गया।
इन सबके बीच आईटीसेल, छद्म समाचार पत्रों, अविश्वसनीय सोशल मीडिया की खबरों, दलीलों के बहाने विभिन्न मंचो पर रालोद का एक सिपाही तमाम विपरीत भाव परिस्थितियों में अपने संघर्ष को जीवित रखते हुए सत्ता को, सत्ता से जुड़े तंत्र को चुनोती देता रहा।


शरीर मे दिव्यांगता को आड़े नही आने दिया और संघर्ष में कमी नही होने दी।
नतीजा विभिन्न मंचो पर तर्क, बहस, उत्तेजना के स्तर तक पहुँची।
जमीनी स्तर पर भी चंद लोगो के साथ विभिन्न मामलों के लिए धरना प्रदर्शन करते हुए लोगो की कम संख्या के बाद भी डटे रहना। लोग तीखी हंसी हंसते, मगर अपने संघर्ष को तिलांजलि नही दी।
ये शख्स रालोद का एक सिपाही ‘सुधीर भारतीय’ है।
“हम फिर वापस आएंगे…” का संकल्प लिए सुधीर भारतीय जैसे कई रालोद कार्यकर्ता लगातार छोटे बड़े मुद्दे पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं..
और उन पर तमाम तरह के मुकदमे भी लादे जा रहे हैं जो उनके हौसलों को कहीं से भी पस्त नहीं कर रहे बल्कि उनके इरादों को चट्टानों की तरह मजबूत करते नजर आ रहे हैं..

फिर कहते है ना ‘जहां आस, वहीं विश्वास’ होता है।

हाथरस में रालोद महासचिव की कमर पर पीठ पीछे से हमला हुआ कई लाठियां जयंत चौधरी की कमर पर पड़ी।
लाठी बरसाने वाले हेलमेट लगाए हुए थे और न जाने क्यों जब वह लाठीचार्ज कर रहे थे तो वहां पर लाठियां बरसाने के स्थान पर सिर और कमर पर ही लाठियां चला रहे थे, क्या यह जान लेने की साज़िश थी….?

 

कुछ लोग कह रहे हैं कि धारा 144 लगी हुई थी वहां जयंत को नहीं जाना चाहिए था। अरे भाई धारा 144 तो देश के किसी ना किसी से में लगातार लगी रहती है।
फिर सत्तारूढ़ दल के कार्यक्रम ही वहां क्यों लगातार आयोजित हो रहे हैं इसका जवाब किसी के पास में ही है..।
कुछ लोग कह रहे हैं कि जयंत चौधरी हाथरस क्यों गए वह राजनीति करने क्यों गए..?

तो भले लोगो, राजनीति कौन करेगा, कैसे करेगा, कब करेगा, किन मुद्दों पर करेगा…?
क्या इसे सत्तापक्ष बताएगा, वह तय करेगा..?

राजनीति में अपनी उपस्थिति को दर्ज करानी जरूरी है और लोकतांत्रिक प्रणाली में जो आज सत्ता में है, कल विपक्ष में होता है जो आज भी पक्ष में है वह कल सत्ता में होता है

वह जनता के बीच में जाता है, मुद्दों पर अपनी बात रखता है, माहौल बनाता है कि मैं आपके लिए कार्य करूंगा, ये मांग पूरी करूंगा।

और जनता का यह हक है उसका अधिकार है कि वह किसी को भी वोट दें… परंतु आज ऐसा लग रहा है कि सत्ता से जुड़े लोग यह सोचते हैं कि सत्ता पर केवल उनका अधिकार है और विपक्ष को राजनीति करने का भी अधिकार शेष नहीं है….

खैर जिस संघर्षशील, लड़ाका जाति से जयंत चौधरी ताल्लुक रखते हैं, उस जाति में पीठ पीछे से वार करने वाले को हमेशा कायर कहा जाता है।
यहां दुश्मन से भी उम्मीद यही की जाती है कि दुश्मनी रखने वाला वार कहकर करेगा और सामने से करेगा।

परंतु एक महिला मीडियाकर्मी को अपने आने का मकसद बता रहे जयंत चौधरी और उनके 6-7 समर्थकों पर अचानक पुलिस ने हमला बोल दिया।

पुलिस का यह कायरता पूर्ण व्यवहार पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा तक के किसानों को अखर गया और देखते देखते संघर्षशील कोम भले वोटर किसी की हो परंतु इस मामले पर सपोर्टर वह घेर कर जान लेने की कोशिश जिस शख्स जयंत के साथ हुई, उसके साथ खड़ा हो गया।

नतीजा, जिस राजनीतिक लड़ाई में 2019 के बाद रालोद सुप्रीमो चंद वोटो से हार, हासिये पर थे।
वे कायरतापूर्ण बरसी लाठियों में सत्ता पक्ष के कहकहे के बीच 8 दिसंबर 2020 को मुजफ्फरनगर के अंदर इतने विशाल हुजूम के साथ अपने आप को प्रस्तुत करने जा रही है कि उसकी कल्पना बड़े से बड़ा विश्लेषक भी कर नहीं पाया होगा।

सच यही है कि तमाम लोग सकते में नजर आएंगे कि जो हाथरस में हुआ है उसका असर मुजफ्फरनगर में कैसे और क्यों दिख रहा है…?

इस सब के पीछे पुलिस की वर्दी के बीच छिप कर एक नेतृत्व प्रदाता की जान लेने का कुत्सित प्रयास था जिसने मृतप्राय लोकदल के हजारों उन सुधीर भारतीय के अंदर रक्त संचार की गति तीव्र कर दी जो संघर्ष की प्रतिमूर्ति तमाम विपरीत परिस्थितियों में बने हुए थे।

लोग सहज विश्वास नहीं करेंगे परंतु दिल्ली और लखनऊ के सियासी गलियारों में यह चर्चा आम है कि इस संघर्षशील कौम के पास ऐसे कार्यकर्ता है जिन्हें आप लाठियों के बलबूते खदेड़ कर उनके नेता पर आंच नहीं ला सकते।

बल्कि लोग तो यह भी कह रहे थे कि यह तो लाठियां थी अगर आप गोलियां भी बरसाते तो अपने नेता के लिए ढाल बनकर खड़े कार्यकर्ता जान दे देते परंतु भागते नहीं ।

और शायद यही वजह है कि जनपद मुजफ्फरनगर के अधिकांश गांव में लोग अपने मन से ही ट्रैक्टर ट्रॉली जोड़कर कल मुजफ्फरनगर की ओर कूच करने वाले हैं।

उन्हें कोई कह नहीं रहा परंतु वह स्वयं से ही कह रहे हैं कि मुजफ्फरनगर चलना है….

8 अक्टूबर 2020 को मुजफ्फरनगर शक्ति का एक बड़ा प्रदर्शन देखने जा रहा है… यह बिल्कुल स्पष्ट है और तय है….और इसमें सबसे बड़ी बात है कि लोग स्वयं की मर्जी से प्रदर्शन का हिस्सा बनने जा रहे।