Home शिक्षा प्रेमी ऋतुराज बसंत

ऋतुराज बसंत

आए गए ऋतुराज बसंत मौसम हुआ सुहाना।
फागुन मन ही मन मुस्काना फागुन मन ही मन मुस्काना।।

पीली चुनरी ओढ़ के सरसों अरहर को लिखा पैगाम।
मोतियन से गेहूं सज गए चना हुए सैयान।
कुहू कुहू कोयल की सुन आम लगे बौराना। फागुन मन ही मन मुस्काना।।

बंदनवार बंधे सजे कलश जले दीया और बाती।
दूल्हा दुल्हन सज गए सज गए सब बाराती।
छोड़ बाबुल का आंगन घर पिया के जाना।
फागुन मन ही मन मुस्काना।।

परिवर्तन की इस दुविधा में दिखा वक्त बातूनी।
कभी धूप कभी छाई बदली सूरज की कैसी अफलातूनी।
दिन दूनी तेज हुई धूप जी दोपहर को अलसाना।
फागुन मन ही मन मुस्काना।।

फागुन की मस्त बहारों में रंगों की सजने लगी दुकाने।
फागुन के मस्त फुहारों में हर उम्र के लगे दीवाने।
देवर के रंग संग होली में बादल भी शरमाना ।।
फागुन मन ही मन मुस्काना।।

लेखिका सरिता पान्डेय