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एक्चुअल में चलने लगा ‘राफेल’ चल रहा था वर्चुअल में बयानों का ‘बोफोर्स’…

पटना। बिहार के चुनाव में जब वर्चुअल रैलियां हो रही थीं कि हमले संतुलित और जमीनी थे। इशारों में बात हो रही थी। दोनों तरफ से ‘बोफोर्स’ जैसे तोपें चल रही थीं। अब एक्चुअल रैलियों का दौर आया है, तो ‘जुबानी हवाई हमले’ बढ़ गए हैं। खास तौर पर एनडीए और महागबंधन के बीच तो अब ऐसे हमले होने लगे हैं, जैसे ‘राफेल’ चल रहा हो। शब्दों की बमबारी और तेज होने के आसार हैं।

अभी पहले चरण के चुनाव के लिए प्रचार शुरू हुए हैं। जदयू की ओर से नीतीश कुमार और राजद की ओर से तेजस्वी यादव हमलावर हैं। उधर, भाजपा की ओर से भूपेंद्र यादव, रविशंकर प्रसाद, सुशील कुमार मोदी समेत कई दिग्गज पूरा बिहार नाप रहे। मगही, भोजपुरी, वज्जिका और मिथिला के खांटी शब्दों का इस्तेमाल हो रहा।

नीतीश के अपने मुद्दे मगर लालू केंद्र में

वर्चुअल रैलियों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्य सरकार की तमाम उपलब्धियों पर विस्तार से जानकारी दे रहे थे। अंत में वह सिर्फ लालू और राबड़ी शासन के साथ अपने कार्यकाल की तुलना करते थे। उसके बाद दौर आया एक्चुअल सभाओं का। नीतीश कुमार की डेढ़ दर्जन से अधिक चुनावी सभाएं हो चुकी हैं। शुरुआती दो दिन यानी 16 अक्टूबर उन्होंने आर्थिक मुद्दों पर लोगों से बात की। पलायन किस तरह था और किस अंदाज में घटा है, उस पर वह केंद्रित रहे। प्रजनन दर में आई कमी पर चर्चा की। चुनावी सभाओं में लोगों को अब तक जीएसडीपी, पर कैपिटा इनकम या फिर ग्रोथ रेट पर सुनने का कोई अनुभव नहीं था। उन्होंने इनका भी जिक्र शुरू किया। पर्यावरण संरक्षण के कार्यों की भी बात की, लेकिन 17 अक्टूबर के बाद उनके लालू परिवार पर हमले बढ़ गए हैं। वह विकास की बात करते हैं। अपने सरकार के कामकाज का लेखा-जोखा भी पेश करते हैं। हर खेत तक सिंचाई का जल पहुंचाने के नए वादे भी करते हैं, लेकिन नाम लिए बगैर लालू परिवार पर जोरदार हमले कर रहे।

बयानों में दिख रही तल्‍खी

वह साफ कहते हैं कि भ्रष्टाचार के आरोप में कुछ लोग जेल में हैं और आगे भी लोग जाएंगे।

तेजस्वी तो पहले से ही नीतीश सरकार के खिलाफ कुछ अधिक आक्रामक हैं, लेकिन उन्होंने पिछले कई दिनों में अपना अंदाज बदला है। पहले वह रोजगार देने और युवाओं के कल्याण की बात कह रहे थे। अब सीधे नाम लेकर नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी पर व्यंग्य कर रहे या आरोप लगा रहे। तेजस्वी लोकसभा चुनाव से हटकर कुछ नई बातें कर रहे लेकिन नीतीश कुमार के खिलाफ इस बार वह अधिक तल्ख हैं।

कैसे बदले नीतीश और तेजस्वी के भाषण के विषय :

15 अक्टूबर

नीतीश : छात्राओं को इंटर पास करने पर 25 और स्नातक उत्तीर्ण करने पर मिलेंगे 50 हजार। अगले कार्यकाल में हर खेत तक पानी पहुंचाने का वादा।

तेजस्वी : राजग ने 15 वर्षों में बर्बाद कर दीं दो पीढिय़ां। युवाओं को नौकरी और रोजगार देने की बात सरकार को हास्यास्पद लगती है।

16 अक्टूबर

नीतीश : पति-पत्नी की सरकार ने कुछ नहीं किया। पति जब अंदर जाने लगे तो पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया। मैंने जब शराब पर रोक लगाई तो कुछ लोग नाराज हो गए। मैंने पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को 50 फीसद आरक्षण दिया।

तेजस्वी : नीतीश शासन में बढ़ी बेरोजगारी, पलायन। डबल इंजन की सरकार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिलवा सकी सुशील मोदी कहते हैं मजदूरों को पलायन करने में मजा आता है।

17 अक्टूबर

नीतीश : ऐसा काम किया तभी अंदर हैं, इनके और लोग भी जाएंगे। न विजन है और न अनुभव, जो मन में आया बोल देते हैं।

तेजस्वी : नीतीश कुमार गरीबी की जगह गरीबों को मिटा रहे हैं। थक गए हैं मुख्यमंत्री। पलायन रोकने में राज्य सरकार विफल।

18 अक्टूबर

नीतीश : कुछ लोगों के लिए बेटा-बेटी ही परिवार। राजद के शासनकाल में होते थे नरसंहार, चलता था अपहरण उद्योग।

तेजस्वी : तीर का युग समाप्त, अब मिसाइल चल रही। जो सरकार बेरोजगारी दूर नहीं कर सकी उसे सत्ता में रहने का कोई अधिकार नहीं। कोविड-19 में राहत केंद्र खोलकर घोटाले किए गए, सभी जिले में मची है लूट।

टिकट भले जाति देख दिया, लेकिन भाषण में कर रहे सबकी बात

इस बार के चुनाव में मुद्दे, भाव-भंगिमा और आरोप-प्रत्यारोप की भाषा बदली-बदली सी है। टिकट वितरण में जातियों को तरजीह भले ही दी गई है, लेकिन सभी दलों के प्रमुख नेताओं के भाषणों की लाइन का अगर विश्लेषण किया जाए तो मैदान में इस मुद्दे पर कोई खास जोर नहीं जा रहा। सभी जात-पात से दूर रहने की कसमे खा रहे हैं।

विकास है एजेंडा मगर सबके अपने-अपने मायने

हालांकि विकास का मुद्दा सबके एजेंडे में है। मगर परिभाषा अलग-अलग। भाजपा-जदयू नेताओं की सभाओं में विकास का मतलब 2005 से अबतक बिहार की तरक्की है। 12 फीसद की विकास दर है। सड़कें हैं। बिजली हैं। साइकिल से सड़कों पर स्कूल जाती बच्चियां हैं। सुशासन है। हर बार की तरह लालू प्रसाद का कार्यकाल भी राजग के प्रमुख मुद्दों में सबसे ऊपर है। जंगलराज और परिवारवाद का शोर भी कम नहीं है।

तेजस्‍वी पिता लालू प्रसाद के कार्यकाल से छुड़ा रहे पीछा

महागठबंधन के मुख्यमंत्री प्रत्याशी तेजस्वी यादव राजग के उन तमाम मुद्दों से पीछा छुड़ाते दिख रहे हैं, जो पिछले करीब तीन दशकों से बिहार की सियासत में हावी है। भाजपा और जदयू के प्रमुख नेता लालू प्रसाद के कार्यकाल को फिर से अखाड़े में खींचकर लाना चाह रहे हैं, लेकिन तेजस्वी रोजी-रोजगार की बात कर रहे हैं। पलायन रोकने के वादे कर रहे हैं। तेजस्वी सत्ता में आएं या नहीं आएं पर चुनाव को नई संस्कृति की ओर ले जाने की कोशिश करते जरूर दिख रहे हैं। राजग के विकास के दावे को महागठबंधन की ओर से झुठलाया जा रहा है। राजद की नजरों में बिहार में अभी तक जितना भी विकास हुआ है, वह स्वाभाविक है। कोई भी सरकार होती तो ऐसा ही हुआ होता।

जाहिर है, पिछली बार से यह चुनाव कई मायनों में अलग दिख रहा है। 2015 में महागठबंधन के प्रमुख भागीदार लालू प्रसाद शुरू से ही डंके की चोट पर अगड़ा बनाम पिछड़ा का राग अलापने लगे थे। अबकी राजद भी ऐसे किसी राग से दूर है।

1990 से 2015 तक का चुनावी राह पर अलग तरह से चला बिहार

बिहार के पिछले कई चुनावों का विश्लेषण करें, तो समझ में आता है कि चुनाव दर चुनाव मुद्दे, भाषा और शैली बदली है।

2015 के चुनाव में गठबंधन का स्वरूप बदला तो जाति और विकास का कॉकटेल बना। नीतीश का चेहरा और लालू के वोट बैंक की जुगलबंदी दिखी। अगड़ा-पिछड़ा का मुद्दा भी खूब उछला।

2010 के चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा बिहारी स्वाभिमान बनकर उभरा। राजग सरकार के पांच सालों में प्रदेश की स्थिति बदली। आम लोगों में विकास के प्रति ललक बढ़ी। सत्ता बरकरार रही।

2005 का चुनाव पूरी तरह सत्ता परिवर्तन का रहा। विकास बनाम जंगलराज को मुद्दा बनाया गया। नीतीश के रूप में लोगों को विकल्प दिखा। आखिरकार बदलाव का रोडमैप भी तैयार हो गया।

– 1990 के बाद की राजनीतिक स्थिति पहले की तरह नहीं रही। मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद कांग्रेस को पस्त करके उभरे क्षेत्रीय दलों ने सियासत को पूरी तरह बदल डाला। 1995 का चुनाव पूरी तरह मंडल के समर्थन और विरोध पर केंद्रित रहा। अगले चुनाव का मुद्दा भी कमोबेश यही रहा पर नीतीश कुमार के नेतृत्व ने प्रभावित किया।