अशोक बालियान,चेयरमैन,पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन

देश की विपक्षी पार्टियों ने हाल में ही हुए लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोलते हुए जनता में भ्रम फैलाया था कि वह संविधान को तोड़ने और लोकतंत्र को नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि यदि हम देश को इतिहास को देखें, तो पता चलता है कि कांग्रेस ने ही देश के संविधान को तोडा था और लोकतंत्र को भी खत्म किया था। जबकि मोदी सरकार ने अपने नौ वर्ष के कार्यकाल में देश के संविधान को तोड़ने और लोकतंत्र को खत्म करने का कोई भी कार्य नहीं किया है।
देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 25 जून 1975 की रात को देश में आपातकाल लगाया गया था। इस घटना को भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय माना जाता है। यह आजादी के बाद की बड़ी राजनीतिक घटनाओं में से एक है। आपातकाल के दौरान नागरिकों के मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया और देश को एक बड़े जेलखाने में तब्दील कर दिया गया था।
प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का रेडियो संदेश प्रसारित होने से पहले 25 जून 1975 की रात को देश में आपातकाल लागू करने का फैसला हो चुका था। आधी रात को ही प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से इस फैसले पर दस्तखत करवा लिए थे। आपातकाल लागू होते ही विपक्ष के तमाम नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था। यह आपातकाल देश में 21 मार्च 1977 तक जारी रहा था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का निर्वाचन रद्द कर दिया था और उनके अगले 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी। इलाहाबद कोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा के पास प्रधानमंत्री पद छोड़ने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था।
यह मामला 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट में गया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी थी, लेकिन इंदिरा गांधी जी को प्रधानमंत्री बने रहने की छूट दे दी थी। वह लोकसभा में जा सकती थी, लेकिन वहां वोट नहीं कर सकती थी।
देश के एक बड़े नेता व समाजवादी चिंतक जयप्रकाश नारायण ने ऐलान किया था कि अगर 25 जून को इंदिरा गांधी अपना पद नहीं छोड़ेंगी, तो अनिश्चितकालीन देशव्यापी आंदोलन किया जाएगा। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में विपक्ष के आगे इंदिरा सरकार कमजोर पड़ती जा रही थी। इसीलिए 25 जून, 1975 की आधी रात से आपातकाल लागू करने का फैसला लिया गया था। और देश में 25 जून की शाम को तमाम अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई थी।
आपातकाल के दौरान जनता ने अपनी आजादी के सबसे बुरे दौर को देखा था। देश में इस दौरान ना केवल चुनाव पर रोक लगा दी गई थी,बल्कि नागरिकों के बुनियादी अधिकारों को भी खत्म कर दिया गया था। जनता के सभी मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिये गये थे। सरकार विरोधी भाषण और किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी गई थी।
आपातकाल के दौरान पुलिस अत्याचार और तमाम बातें बढ़ने लगी थी। इस दौरान पुरुष और महिला बंदियों के साथ अमानवीय अत्याचार किया गया था। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी को सबसे पहले राज नारायण के मुकदमे पर हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश का निपटारा करना था। इसलिए इन फैसलों को पलटने वाला कानून लाया गया था। इसके लिए संविधान को संशोधित किया गया था।
जुलाई 1975 में 38 वें संविधान संशोधन के जरिए न्यायपालिका से आपातकाल की न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार छीन लिया गया था। इसके 2 महीने बाद ही किए गए 39 वें संविधान संशोधन के जरिए राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा के अध्यक्ष के निर्वाचन को न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर कर दिया गया था।
जनवरी 1976 में अनुच्छेद 19 को भी निलंबित कर दिया गया था, इसके तहत अभिव्यक्ति की आजादी, प्रकाशन करने, संघ बनाने और सभा करने की आजादी को भी छीन लिया गया था। इसी दौर में 42 वें संशोधन के जरिए यह प्रावधान किया गया था कि संसद के लिए एक संविधान संशोधन को किसी भी आधार पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती थी। लोकसभा का कार्यकाल भी 5 साल से बढ़ाकर 6 साल का कर दिया गया था।
आपातकाल के दौरान अमृत नाहटा की फिल्म किस्सा कुर्सी का को जब्त कर लिया गया था। किशोर कुमार जैसे गायकों को काली सूची में डाल दिया गया था। और आंधी फिल्म पर पाबंदी लगा दी गई थी।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 (आर्टिकल 370) को संविधान में सबसे बड़ी छेड़छाड़ के रूप में जाना जाता है। जम्मू और कश्मीर के सन्दर्भ में यह अनुच्छेद 17 अक्टूबर 1949 को लाया गया था। गौरतलब है कि सरदार वल्लभभाई पटेल कभी भी इसके पक्ष में नहीं थे, इसलिए उन्होंने इसे निष्प्रभावी बनाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला की वजह से वे ऐसा नहीं कर सके थे।
राजीव गाँधी के कार्यकाल में वर्ष 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो मामले में उन्हें तलाक देने वाले शौहर को हर महीने गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने इसे मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल बताकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जबरदस्त विरोध किया, तो वर्ष 1986 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक दिए थे और संसद में कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया था। इसप्रकार राजीव गाँधी सरकार ने भी संविधान की मूल भावना जो किसी के भी तुष्टीकरण से सम्बन्ध नहीं रखती थी, उसको मिटा दिया था।
केंद्र की मोदी सरकार ने अभी तक मुख्य रूप से एक संशोधन आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों को सरकारी नौकरियों में दस फ़ीसदी आरक्षण देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में किया था। दूसरा संशोधन राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के लिए किया था। तीसरा संशोधन जम्मू और कश्मीर के विशेष दर्जे के सन्दर्भ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 (आर्टिकल 370) को खत्म किया है। भारतीय संविधान के इस अनुच्छेद की आड़ में जम्मू और कश्मीर में अलगाववाद को बढ़ावा मिल रहा था।
आज कुछ लोग मोदी सरकार पर आरोप लगा रहे है कि ये सरकार संविधान को नष्ट करने का कार्य कर रही है, जबकि सच्चाई यह है कि कांग्रेस ने ही संविधान को अनेकों बार नष्ट करने के लिए उसमे उसकी मूल भावना से विपरीत संशोधन किये थे।

लेख-अशोक बालियान

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